• Vishwajeet Maurya

“किसी की भी नहीं है ये बंदी, कहते हैं इसे नोटबंदी”

PMO के अन्दर वाले चिलमची सूत्रों के द्वारा बताया जा रहा है कि, एक बार फिर से नोटबंदी हो सकती है, ऐसे अनुमान है कि इस बार सिर्फ ‘चिप वाले नोटों’ को ही बंद किया जाएगा. हाल ही में खबर आई थी कि, आज कल नोट बहुत ज्यादा सिग्नल भेज रहे हैं. निजीकरण के इस दौर में कर्मचारियों की शिफ्ट में बदलाव किया गया. ‘स्टेट ऑफ द आर्ट नैनो टेक्नोलॉजी’ के खोजकर्ता व ‘नैनो-जीपीएस चिप इन इंडियन करेंसी’ नामक किताब के लेखक व महान पत्रकार ‘अधीर चौधरी’ को देश भर के बैंक कर्मचारियों ने गालियों से भरे एक संयुक्त शिकायती पत्र में कहा कि, पिछले कुछ दिनों से उनके इस यन्त्र ने कुछ ज्यादा ही सिग्नल भेजने शुरू कर दिए हैं. इस वजह से न तो हम ग्राहक को ‘सर्वर न आने का’ बहाना बता कर बेवकूफ बना पा रहे हैं, और न ही हम बगल वाली कैशियर संगीता से बतिया पा रहे हैं. पहले हम लोगों को ‘सिग्नेचर मैच नहीं कर रहे हैं, फ़ार्म पूरा भरकर लाओ, आधार कार्ड वाला काम केवल गुरुवार को होता है, लंच का टाइम है, पासबुक प्रिंट नहीं हो पायेगी. प्रिंटर ख़राब है, आज मैनेजर साहब नहीं है” आदि इत्यादि वाले डायलाग बोल के भगा देते थे, लेकिन जब से नोट धकाधक सिग्नल भेज रहा है, तब से एक बार भी व्हाट्सएप के फैमिली ग्रुप में ‘नाचते हुए मोर के साथ गुड मॉर्निंग वाला मेसेज’ तक नहीं भेज पाए हैं. इतना ही नहीं यहाँ तक कि गुटखा थूकना और पेशाब एक साथ उसी देसी लैट्रीन में करना पड़ रहा है जिसका ‘फ्लश’ पिछले 2 साल से ख़राब है, ‘जंजीर से बंधा मग’ हमने शुरुआत से इसलिए नहीं रखा था क्योंकि हम नहीं चाहते थे कि कोई ये कहे कि इन्होनें तो ‘भारतीय रेलवे’ का आइडिया चुराया है. शिकायती पत्र में युवा बैंक कर्मचारियों ने भी अपनी समस्या बताई है कि ‘हम लोग महीनों से मूत्रालय में गुटखे के छोटे-छोटे टुकड़ों और छीटों से सने शीशे में ‘मिरर सेल्फी’ तक नहीं ले पाएं हैं, जो हम दिन में तीन बार अपनी महिला मित्रों व पत्नियों को बैंक में मौजूद होने के सबूत के तौर पर भेजा करते थे. 2000 की नोट गिन-गिन कर तर्जनी घिस गयी है, कुछ दिन ऐसा ही रहा तो डार्विन की थ्योरी उल्टी हो जाएगी और हाँथ से तर्जनी नामक उंगली गायब हो जाएगी. हमें ऐसा प्रतीत होता है कि जब से आपकी ‘महुआ मोइत्रा’ वाली रिसर्च गलत हुई है तब से सिग्नल कुछ ज्यादा ही आ रहा है. आठ घंटे की शिफ्ट को 24 घंटे में बदल दिया गया है और उन्हें संजय राउत की तरह कम तनख्वाह पर ज्यादा काम कराया जा रहा है. बैंकों के विलय और निजीकरण की चिंता को दिल में दबाने के बावजूद कर्मचारी पहले से ही VRS लेने की सोंच रहे थे लेकिन अब उनके सामने ‘काटो तो खून नहीं’ वाली समस्या आन पड़ी है. अतः आप से निवेदन है कि जल्द से जल्द आप अपने यन्त्र का कुछ निवारण करें, क्योंकि विदेशों से काला-धन भी वापस आ चुका है और आतंकवाद के साथ-साथ अर्थव्यवस्था की भी कमर टूट चुकी है.

जय हो ...गोविन्द



नोट-: व्यंग्य को पढ़कर लोड न ले, मज़े करिए, खुश रहिए.


-Govind Pratap Singh

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