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1.5 साल से फंसी 69,000 प्राथमिक सहायक शिक्षकों की भर्ती का रास्ता साफ

इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ खंडपीठ ने सुनाया फैसला, तीन माह के भीतर भर्ती प्रक्रिया पूरी करने का दिया निर्देश

6 मई 2020 को आए फैसले में लखनऊ खंड पीठ ने सरकार की 65-60% कट ऑफ़ वाली गणित पर अपनी मुहर लगा दी है। हाईकोर्ट ने 3 महीने के अंदर भर्ती प्रक्रिया को पूरा करने का निर्देश दिया है।

इतिहास

5 दिसंबर 2018 को उत्तर प्रदेश के प्राथमिक विद्यालयों में 69,000 सहायक अध्यापकों की भर्ती के लिए आवेदन मांगे गए थे। 6-20 दिसंबर तक ऑनलाइन आवेदन की तिथि थी। जिसमें 4,31,466 अभ्यर्थियों ने रजिस्ट्रेशन कराया था। इसकी लिखित परीक्षा 6 जनवरी 2019 को उत्तर प्रदेश के 800 परीक्षा केंद्रों में हुई थी। जिसमें 3,86,000 परीक्षार्थी बैठे थे और लगभग 40 हज़ार से अधिक परीक्षार्थियों ने परीक्षा छोड़ दी थी।


प्रतीकात्मक तस्वीर साभार: इंटरनेट

विवाद क्यों हुआ?

दरअसल, उत्तर प्रदेश शासन के आदेश में भर्ती को लेकर न्यूनतम कट ऑफ़ का ज़िक्र तो था लेकिन यह नहीं बताया गया था कि ये कट ऑफ़ कितने प्रतिशत का होगा। 6 जनवरी को लिखित परीक्षा होने के अगले दिन यानी 7 जनवरी को न्यूनतम कट ऑफ़ की घोषणा की जाती है। जिसमें यह बताया जाता है कि चयन के लिए सामान्य वर्ग के अभ्यर्थियों को 150 में से कम से कम 97 अंक लाने हैं और आरक्षित वर्ग के अभ्यर्थियों को 150 अंकों में से 90 अंक लाने होंगे। कुछ अभ्यर्थियों ने इस शासनादेश को भेदभावपूर्ण बताकर न्यायालय में इसे चुनौती दी। याचिका दायर करने वाले अभ्यर्थियों की दलील थी कि इससे पहले आयोजित इसी परीक्षा में सामान्य वर्ग के लिए 45% और आरक्षित वर्ग को लिए 40% कट ऑफ़ था। तो इस बार इतना अधिक कट ऑफ़ क्यों रखा जा रहा है? इसके जवाब में सरकार ने कहा कि ,"इस बार पहले की तुलना में अधिक अभ्यर्थी हैं इसलिए क्वालिफाइंग मार्क्स बढ़ाया जा रहा है।" सरकार का एक पक्ष यह भी है कि वह शिक्षा में गुणवत्ता बढ़ाने के लिए ऐसा कर रही है।


तब याचिकाकर्ताओं ने कहा कि हम शिक्षामित्र हैं। हमें सर्वोच्च न्यायालय के आदेश पर आगामी दो परीक्षाओं में 25 अंक का वेटेज़ मिलना है। 2018 की सहायक शिक्षक भर्ती परीक्षा में हम भाग ले चुके हैं। उसमें क्वालिफाइंग मार्क्स 45% और 40% था। अब शिक्षक बनने के लिए यह हमारा आखिरी मौका है। इसलिए इस परीक्षा में भी वही पुराना क्वालिफाइंग मार्क्स होना चाहिए।


क्या था पहला फैसला?

पिछले साल 29 मार्च को न्यायमूर्ति राजेश सिंह चौहान ने सभी याचिकाओं की एक साथ सुनवाई करते हुए सरकार के शासनादेश को रद्द कर दिया था। उन्होंने परीक्षा नियंत्रक प्राधिकरण को 2018 की परीक्षा के अनुसार ही क्वालिफाइंग मार्क्स 45% और 40% रखते हुए तीन माह के भीतर परीक्षा परिणाम घोषित करने का आदेश दिया था।


आज क्या हुआ?

न्यायमूर्ति राजेश सिंह चौहान की सिंगल बेंच के फैसले के खिलाफ उत्तर प्रदेश सरकार की ओर से महाधिवक्ता रघुवेंद सिंह और अपर मुख्य स्थायी अधिवक्ता विजय सिंह ने पुनर्विचार याचिका दायर की थी।


लखनऊ खंडपीठ

इस याचिका की सुनवाई कर न्याायधीश पंकज कुमार जयसवाल और न्यायाधीश करुणेश सिंह की बेंच ने 3 मार्च 2020 को फैसला सुरक्षित रख लिया था। 6 मई 2020 को आए फैसले में इस पीठ ने सरकार की 65-60% कट ऑफ़ वाली गणित पर अपनी मुहर लगा दी है। हाईकोर्ट ने 3 महीने के अंदर भर्ती प्रक्रिया को पूरा करने का निर्देश दिया है।

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