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जन्मदिन विशेष - हिंदी सिनेमा के 'प्राण'

शिवम चौहान

साल था 1970, जिस समय शो मैन राजकपूर की फ़िल्म 'मेरा नाम जोकर' बुरी तरह पिट गयी थी, कपूर साहब आर्थिक रूप से बेहद कमजोर पड़ गए थे। इसके बाद राजकपूर साहब एक फ़िल्म के जरिये वापसी करना चाह रहे थे, फ़िल्म थी 'बॉबी', एक टीनएज लव स्टोरी।


कपूर साहब इस फ़िल्म में प्राण साहब को 'प्राण' डालने के लिए रखना चाहते थे लेकिन आर्थिक तंगी व कम बजट होने के कारण उस दौर के महंगे खलनायक को फ़िल्म में रख पाना उनके बस की बात नहीं थी। खैर किसी तरह ये बात प्राण साहब को पता लगी और वे फ़ौरन राज कपूर से बात किए और फ़िल्म में काम करने को लेकर हामी भर दी।


प्राण


फ़िल्म हिट ही नहीं सुपरहिट हुई लेकिन प्राण साहब ने मेहनताना और शगुन के तौर पर मात्र एक रुपये लिए। ये था उनके नायक होने की रियल स्टोरी। कहा जाता है कि प्राण साहब कपूर खानदान के हर पीढ़ी के साथ काम किये।


रीयल लाइफ में नायक रहे प्राण फिल्मों में अधिकतर विलेन का ही किरदार निभाते थे। मुँह से सिगरेट का कश छोड़ते हुए, चेहरे के भाव को पल-पल बदलते हुए खलनायकी डायलॉग मारना कोई कैसे भूल सकता है?


हिंदी फिल्मों के 'प्राण' जिसने फिल्मों में खलनायकी के रोल को एक नया आयाम दिया, जिसनें अपनी खलनायकी रोल से दर्शकों के अंदर एक अजीब सिहरन पैदा कर दिया आज 12 फरवरी को उनका जन्मदिन है। वे पचास और सत्तर के दशक में खलनायक के रोल में एक छत्र राज किए और अपने दमदार अभिनय का लोहा मनवाया।


प्राण जब फिल्मों में खलनायक का रोल निभाते थे तो सिर्फ अभिनय ही नहीं करते थे वे उस किरदार में बिल्कुल डूब जाते थे। यही वजह थी कि उनका हर किरदार जीवंत होता था।


प्राण की शुरुआती फ़िल्में देखें या बाद की फ़िल्में, उनकी अदाकारी में दोहराव कहीं नज़र नहीं आता। उनके मुंह से निकलने वाले संवाद दर्शकों को अंदर तक प्रभावित करते हैं। भूमिका चाहे मामूली लुटेरे की हो या किसी बड़े गिरोह के मुखिया की हो या फिर कोई लाचार पिता की हो, प्राण ने सभी के साथ न्याय किया है।


प्राण साहब की फिल्में आज भी लोग नहीं भूले हैं यह उनकी विशिष्ट शैली ही थी कि कभी-कभी लगता है कि खलनायक ही फ़िल्म में भारी पड़ रहा है।


प्राण आज भले ही नहीं हैं पर भारतीय फिल्मों में अपना 'प्राण' छोड़कर वे चले गए। जिनका अमिट छाप भारतीय सीने जगत पर हमेशा बना रहेगा।


प्राण का सफर...


प्राण का पूरा नाम 'प्राण कृष्ण सिकंद' था 12 फरवरी 1920 को पुरानी दिल्ली में जन्में प्राण बचपन से ही अभिनय में रूचि रखते थे। मुहल्ले में रामलीला में जरूर किरदार निभाते थे।


उनके फिल्मों में अभिनय की कहानी शुरू होती है एक पान के दुकान से जहां लाहौर के जाने-माने पटकथा लेखक केवल सूरत देख फिल्मों के लिये ऑफर दे दिए लेकिन प्राण टालते रहे और बार-बार कहने के कारण अंत मे प्राण मान गए और फ़िल्म 'यमला जट' में पहली बार दिखे। फ़िल्म काफी हिट साबित हुई और फिर प्राण को यहीं से फ़िल्म में कैरियर बनाने की दिशा मिली।


इसी बीच भारत-पाकिस्तान का बंटवारा हुआ तब तक प्राण ने लगभग 22 फिल्में कर चुके थे।

अपने किरदार को हमेशा बचाये रखने के लिए वे ठाने की अब सिर्फ खलनायक का ही रोल करेंगे और फ़िल्म ज़िद्दी से बतौर खलनायक रोल अदा करने लगे और लगभग 4 दशक के लंबे समय तक खलनायक का किरदार जीते रहे।


जीवन के आखिरी समय में वे बीमार रहने लगे थे और पहली बार 78 की उम्र में दिल का दौरा पड़ा लेकिन वे मौत को मात दे गए।अपनी बीमारी से जूझते हुए 12 जुलाई 2013 को प्राण संसार से विदा ले लिए।

प्राण आज हम सभी के बीच नहीं हैं लेकिन उनकी फिल्में आज भी उनके मौजूद होने का एहसास कराती है।

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