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मामूली आदमी से तानाशाह बनने तक, हिटलर का सफ़र

जब भी जर्मनी के तानाशाह एडोल्फ़ हिटलर का ज़िक्र होता है. एक सवाल सबके मन में उठता है. वह यह कि आख़िर हिटलर जैसे अड़ियल व्यक्तित्व का मालिक यूरोप के एक प्रबुद्ध देश का शासक और लाख़ों लोगों का चहेता कैसे बन गया?

इस सवाल का ज़वाब ढूंढने के लिए हमें उस समय के हालात ख़ासकर पहले विश्व युद्ध में जर्मनी की हार और 1930 के दशक की आर्थिक मंदी को समझना ज़रूरी है. साथ ही हमें हिटलर के नेतृत्व के स्वरूप को भी समझना होगा.

हिटलर के नेतृत्व के उस पहलू पर ग़ौर करना शायद मौजूदा समय में भी बहुत प्रासंगिक है. हिटलर उस तरह के आम नेता नहीं थे जो टैक्स कम करने या बेहतर स्वास्थ्य सुविधा मुहैया कराने का वादा करते थे. वे तो एक धार्मिक नेता की तरह लोगों को मुक्ति दिलाने का वादा करते थे.

पहले विश्व युद्ध से पहले उन्हें कोई नहीं जानता था. वे एक मामूली आदमी थे. जो कि ना किसी से क़रीबी रिश्ते बना पाते थे. ना ही लोगों से बौद्धिक बातें कर सकते थे और जो नफ़रत और पूर्वाग्रह से भरे हुए थे.


हिटलर अपने भाषण के लिए जाने जाते थे

कमज़ोरी बनी ताक़त:

1920 के दशक में हिटलर इतने करिश्माई हो गए थे कि वो जो भी कहते थे, लोग उस पर विश्वास करते थे. लेकिन बहुत से लोग ऐसे भी थे जिन्हें हिटलर ज़रा भी नहीं भाते थे.

एमिल क्लिन:

लेकिन पहले विश्व युद्ध में जर्मनी की हार के बाद हिटलर ने जब म्यूनिख़ में भाषण दिया तो उनकी कमज़ोरियों को ही उनकी ताक़त समझा जाने लगा.

हिटलर के अंदर जो नफ़रत की भावना थी, वो हज़ारों जर्मनवासियों की भावना से मेल खाती थी जो कि वर्साय संधि की शर्तों से अपमानित और शर्मिंदा महसूस कर रहे थे. उसी तरह हिटलर का एक अच्छा वक्ता ना होना उनके व्यक्तित्व की ताक़त बन गई. उनकी बड़ी-बड़ी बातों के कारण उन्हें एक महान व्यक्ति कहा जाने लगा. जो कि भीड़ से अलग अपनी सोच रखता है. लेकिन इन सबसे ज़्यादा महत्वपूर्ण बात ये थी कि हिटलर जर्मन की जनता से संवाद कर सकता था और इसे ही कई लोग हिटलर का करिश्मा कहने लगे.

1920 के दशक में हिटलर को सुनने वाले एमिल क्लिन के अनुसार हिटलर इतने करिश्माई हो गए थे कि वो जो भी कहते थे, लोग उस पर विश्वास करते थे.

1920 के दशक में जब जर्मनी की अर्थव्यवस्था अच्छी थी तो हिटलर को केवल कुछ कट्टरपंथी ही पसंद करते थे. यहां तक की 1928 के चुनाव में हिटलर की नाज़ी पार्टी को केवल 2.6 फीसदी वोट मिले थे. लेकिन अगले पांच से भी कम वर्षों में हिटलर जर्मनी के चांसलर और सबसे जानी मानी राजनीतिक पार्टी के नेता बन गए थे.


हिटलर का घर

आर्थिक संकट:

इस बीच जो सबसे बड़ा बदलाव हुआ. वो बदलाव जर्मनी की अर्थव्यवस्था में हुआ था. 1929 के आर्थिक मंदी के कारण जर्मनी के बैंक तबाह हो गए थे. बड़े पैमाने पर बेरोज़गारी बढ़ गई थी.

नाज़ी पार्टी की एक समर्थक जुटा रयूडिजर कहती है, ''लोग भूखे थे. बहुत बुरे दिन चल रहे थे. हिटलर के बयानों से लोगों को लगता था कि वो सारी समस्याओं से मुक्ति दिला देंगें. मुझे भी लगने लगा था कि यह (हिटलर) एक ऐसा आदमी है जो अपने लिए कुछ नहीं सोचता है, सिर्फ़ जर्मन लोगों की भलाई के बारे में सोचता है.''

हिटलर लाखों जर्मन वासियों से कहते थे कि वे आर्य हैं और इसलिए वे ख़ास हैं और दूसरी सभी नस्लों से बेहतर है. हिटलर ने प्रजातंत्र से अपनी नफ़रत और राजनीतिक फायदे के लिए हिंसा के इस्तेमाल में यक़ीन को कभी नहीं छिपाया. लेकिन उन्होंने केवल कम्युनिस्टों और यहूदियों को ही जर्मनी का दुश्मन क़रार दिया और उन्हीं के विरूद्ध बोलते थे. चूंकि अधिकतर जर्मनवासी इन दो कैटगरी में नहीं थे इसलिए उनको किसी तरह का कोई नुक़सान नहीं होता था.


हिटलर द्वारा लिखित क़िताब साभार: टाइम मैगज़ीन

आर्थिक संकट में लाखों लोगों ने एक ऐसे व्यक्ति को अपना नेता मान लिया जो केवल इसलिए करिश्माई बन गया क्योंकि वो लोगों के डर, उनकी आशा और अपनी परेशानियों के लिए दूसरों को ज़िम्मेदार ठहराने की आदत का लाभ उठाना जानता था. लेकिन लाखों लोगों को इसके गंभीर परिणाम भुगतने पड़े.

ये एक दुखद विडंबना है कि जर्मनी की मौजूदा चांसलर एंजेला मर्केल का एथेंस में नाराज़ ग्रीसवासियों ने स्वास्तिक बैनरों के साथ ये कहते हुए विरोध किया कि जर्मनी उनके देश में हस्तक्षेप कर रहा है.

आर्थिक तंगी से जूझ रहे ग्रीस में 'गोल्डेन डॉन' नाम के एक राजनीतिक दल का अचानक उत्थान चिंता का विषय क्योकि ये दल अल्पसंख्यकों पर ज़ुल्म करने और अपनी असहिष्णुता के लिए ही जाना जाता है.

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