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इलाहाबाद : मोहब्बत भरी उम्मीद

कौशलेन्द्र यादव

जब वो इलाहाबाद छोड़ रहा था। तब उस शहर से बिछड़ने के डर से उसका कलेजा काँप उठा था।

अपनी नाक़ाम मोहब्बत को ढूंढती उसकी बेचैन आँखों ने संगम से लेकर यूनिवर्सिटी तक हर चेहरे में उसे तलाशने की कोशिश की थी। उसे नहीं मिलना था। वो नहीं मिली।

अपनी माशुका की तलाश में वो बेचैन होकर इधर-उधर पूरे शहर की ख़ाक छान रहा था। उसकी ओर पीठ किए हर लड़की में उसे वही नज़र आती।

हर लहराती ज़ुल्फ उसे अपनी माशुका की सी मालूम होती। लेकिन सामने जाने पर उसकी अपनी माशुका किसी अनजान लड़की में बदल जाती थी ।

हताश-निराश वो अपने कमरे में लौट आया। सारा दिन कमरेे में अकेले रोता रहा। शाम को शहर छोड़ने से पहले जब वो कमरे की चाभी मकान मालकिन को देने गया।

तब आंटी ने कहा "तुम्हारा चेहरा रुआँसा क्यों है?"

आंटी के गले लगकर वह फूटकर रो पड़़ा था।


उसकी मोहब्बत से अंजान उसकी मकान मालकिन सोच रही थी कि शायद लड़के को कमरे से मोह हो गया है। इस इलाहाबाद शहर से मोह हो गया है। इसलिए रो रहा है। लिहाज़ा उन्होंने सांत्वना भरे शब्दों के साथ ज्ञान देते हुए कहा- "दिल छोटा न करो बेटा! एक न एक दिन इस शहर को तुम्हें विदा करना ही था। क्यूँकि तुमने इस शहर को अपनाया ही इतने दिनों के लिए था। जाओ! अपनी नयी ज़िंदगी की शुरुआत करो."


मकान मालकिन के लिए इलाहाबाद महज़ एक शहर था। लेकिन उस लड़के के लिए इलाहाबाद के मायने बदल चुके थे। उसके लिए अब इलाहाबाद "वो" लड़की थी। इलाहाबाद उसके लिए अब "मोहब्बत" था। उसके लिए इलाहाबाद महज़ सड़कों, इमारतों से बना एक शहर भर नहीं बल्कि लहराती ज़ुल्फों और छरहरी काया लिए उसकी "माशुका" में बदल गया था। जो अब उस जाने पहचाने शहर की अंजान भीड़ में गुम हो चुका था। उसका यही असफल प्रेम ही अब "इलाहाबाद" था। इलाहाबाद आम लोगों की संगम नगरी.... उसकी प्रेमनगरी बन चुकी थी।

हाल ही में जब उसे पता चला कि राज्य सरकार ने इलाहाबाद का नाम बदलकर प्रयागराज रख दिया है।

तो न जाने क्यों उसे बहुत बुरा लगा था। उसे लगा था मानो किसी ने उसके महबूब का पता बदलने की कोशिश की है।

फेसबुक पर सिर्फ़ अपनी मोहब्बत को तलाश करने वाले उस लड़के ने उस रोज़ पहली बार अपनी टाइमलाइन पर लिखा था।


"पता बदलकर उसका .. क्या मेरी याद बदल पाओगे?

प्रयागराज कह देने से क्या इलाहाबाद बदल पाओगे?"


इलाहाबाद Photo Courtesy : Pramesh Sadh


वो अपने घर तो लौट आया लेकिन उसका मन वहीं-कहीं, उसी शहर में छूट गया। थोड़ा-थोड़ा बंटकर। अपने दिल का कुछ हिस्सा वो इंग्लिश डिपार्टमेंट में छोड़ आया था.


इलाहाबाद विश्वविद्यालय : Photo Courtesy Shivam Chauhan

तो कुछ भाग सुनील चाट की दुकान पर। जहां पहली बार उसने अपने महबूब को उसकी सहेलियों के साथ चाट में थोड़ी खट्टी चटनी और मांगते हुए देखा था।

उसका कुछ हिस्सा कोचिंग के दोस्तों के पास भी रह गया था। कुछ शहर के उस कमरे के पास और बाकी जो बचा वो उस लड़की को दे आया था।


आज भी जब वो इलाहाबाद जाता है। तब चारों तरफ़ उस लड़की को तलाशती उसकी आँखें उसको न देख पाने के सूनेपन से भर उठती हैं। हर बार उसके सीने में आख़िरी बार उसके मुस्कुराते चेहरे का दीदार ना कर पाने की टीस उठती है।आख़िरी बार उसकी आवाज़ न सुन पाने की एक कसक उठती है लेकिन फिर भी वो जाता है उस शहर में क्योंकि उसे उम्मीद है बिछड़ के फिर से मिल जाने की। वो कुंभ के उन तमाम भक्तों की तरह हर साल संगम जाता है कि शायद इस बार लेटे हनुमान जी उसकी मुराद पूरी कर दें।

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