• Vishwajeet Maurya

लालच की भेंट चढ़ता पृथ्वी का फेफड़ा "अमेज़न"

Updated: Sep 4, 2019

इस समय अमेज़न के जंगल कितनी बड़ी तबाही का सामना कर रहे है वो रोज़ आ रही तस्वीरें सारी सच्चाई बयां कर रही है, कई हेक्टेयर जंगल धुएं में तब्दील होते जा रहे हैं, अब तक हजारों हेक्टेयर जंगल तबाह हो चुके होंगे, बादलों से ढंके और हरियाली से घिरे पर दूर से किसी रहस्य की तरह, सदियों से अमेज़न की शान माने जाने वाले अमेज़न के जंगलों से हजारों किलोमीटर दूर बसा है साओ पाउलो शहर...अमेज़न का जंगल साओ पाउलो शहर से लगभग 3000 किलोमीटर दूर है, लेकिन वहाँ पर लगी आग का धुआं अब साओ पाउलो शहर के ऊपर मंडरा रहा है. साओ पाउलो बहुत बड़ा शहर है जो कि लगभग 2,200 फीट की ऊँचाई पर बसा है और वहां इस समय सर्दी का मौसम है जिसके कारण धुंआ काफी नीचे आ गया है. आग से पैदा हुए धुएं की वजह से पर्यावरण को भारी नुकसान हो रहा है. नासा की मानें तो ये धुआं अटलांटिक तटों तक फैल रहा है. यानी यह फैलकर 2800 वर्ग किमी क्षेत्रफल को घेर रहा है. आग से बड़ी मात्रा में कार्बन डाईऑक्साइड पैदा हो रही है. इस साल 228 मेगाटन कार्बन डाईऑक्साइड पैदा हुई है. यह 2010 के बाद सबसे ज्यादा है. जहरीली गैस कार्बन मोनो ऑक्साइड भी पैदा हो रही है. यह दक्षिणी अमेरिका के तटीय इलाकों तक पहुंच चुकी है. यही नहीं ये धुंआ अब अर्जेंटीना के ब्यूनस आयर्स तक पहुँच गया है, ब्राज़ील के उत्तर में एक शहर है पोर्तुवेले, धुएं के कारण वहां का एयरपोर्ट बंद कर दिया है.


अमेज़न के आग का विकराल रूप


साओ पाउलो शहर के आसमान को काला कर देने वाले धुंआँ लोगों की आखों में ऐसा चुभा कि यूरोप के कई शहरों में विरोध प्रदर्शन हुए, ब्रिटेन की राजधानी लन्दन, स्पेन की राजधानी मैड्रिड, फ्रांस की राजधानी पेरिस, साइप्रस, कोलंबिया, उरुग्वे में भी लोग सड़कों पर उतरे और ब्राज़ील के राष्ट्रपति और वहां की सरकार के ख़िलाफ़ विरोध दर्ज कराया. अमेज़न की आग का मुद्दा G-7 समूह की बैठक में भी उठा और आग से निपटने के लिए ब्राज़ील को वित्तीय मदद जिसमें 22 मिलियन डॉलर (157 करोड़ रुपए) की राशि देने पर सहमति बनी. ब्राजील ने पहले तो इस राशि को लेने से इनकार कर दिया था, लेकिन अब वह इस पर सहमत हो गया है. ब्राजील के राष्ट्रपति जेयर बोल्सनारो के प्रवक्ता ओटावियो रिगो बरोज ने कहा, ''ब्राजील सरकार राष्ट्रपति के जरिए संगठनों और देशों से आर्थिक मदद लेने को तैयार है अगर यह पैसा ब्राजील में प्रवेश करने पर ब्राजील के लोगों के नियंत्रण में होगा तो ” इसके पहले फ्रांस, फ़िनलैंड, आयरलैंड यूरोपीय यूनियन से मांग की, कि ब्राज़ील सरकार पर दबाव बनाया जाए .


वैसे इस समय जंगल की आग से बोलिविया भी परेशान है लेकिन दुनिया के रडार पर ब्राज़ील ही है, फ्रांस और यूरोप के कई देश ब्राज़ील की आग को लेकर बेवज़ह ही फिक्र नहीं दिखा रहे हैं, दुनिया भर के पर्यावरणविदों की राय में यदि दुनिया को एक शरीर माना जाए तो अमेज़न के जंगल उसके फेफड़े और गुर्दे की तरह हैं,अमेज़न दुनिया का सबसे बड़ा रेन फारेस्ट है, इसी वजह से वहां का मौसम में भरपूर नमीं पाई जाती है, अमेजन वन की जलवायु जुलाई-अगस्त में उष्ण-आर्द्र बनी रहती है जबकि सितंबर से लेकर नवंबर मध्य तक यह शुष्क हो जाती है। अधिकारियों के मुताबिक, जंगल में आग लगने की अधिकांश घटनाओं का कारण खेती और पशुपालन होता है। वहाँ पर बारिश बहुत होती है और आयतन के हिसाब से दुनिया की सबसे बड़ी नदी और लम्बाई के हिसाब से विश्व की दूसरी सबसे बड़ी नदी अमेज़न भी वहीँ से निकलती है.


अमेज़न को दुनिया का सबसे बड़ा “कार्बन सिंक” भी कहते हैं, पूरी दुनिया से निकले कार्बन का 20 % कार्बन, यह जंगल अकेले सोख लेता है. यानी कि ब्राजील का यह वनक्षेत्र दुनिया का कुल 20 % ऑक्सीजन पैदा करता यह बेसिन सत्तर लाख वर्ग किलोमीटर (1.7 अरब एकड़) क्षेत्र पर फैला है जिसमें से 55 (1.4 अरब एकड़) लाख वर्ग किलीमीटर पर वर्षावन खड़े है। यह क्षेत्र नौ देशों की सीमाओं में पड़ता है। वनों का अधिकांश भाग (60 %) ब्राजील की सीमा में है। इसके बाद पेरू में 13 % और अन्य देशों कोलंबिया, वेनेजुएला, ईक्वाडोर, बोलिविया, गुयाना, सूरीनाम और फ्रेंच गुयाना में ये वन फैले हुए हैं। अगर ये जंगल यहाँ से कटने शुरू हो जाएंगे, तो कार्बन को सिंक कर लेने की इसकी भूमिका में खतरा उत्पन्न हो जाएगा. अमेज़न के जंगल में पौधों और जंतुओं की करीब 30,000 प्रजातियाँ हैं. विशेषज्ञों के मुताबिक इस जंगल में करीब 113 प्रकार की ऐसी जनजातियाँ हैं जिनका सभ्यता से अभी तक किसी भी प्रकार का संपर्क नहीं हो पाया है. जिनमें से 27 प्रकार की आदिम जनजातियों के बारे में पुष्टि भी हो चुकी है.




अमेज़न का जंगल दुनिया का सबसे बड़ा इकोसिस्टम है, जितनी जैव-विविधता यहाँ के जंगलों में हैं उतनी पूरे विश्व में कहीं नहीं है। यह पूरे विश्व का कुल 10 % जैव-विविधता वाला क्षेत्र है। इस क्षेत्र को ‘पृथ्वी के फेफड़ा’ माना जाता है। यह जलवायु को नियंत्रित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। वैज्ञानिकों के मुताबिक, यदि यह वन क्षेत्र खत्म होता है तो इसका दुनिया पर बुरा असर पड़ेगा। अमेज़न को हो रहा नुकसान पूरी दुनिया पर असर डाल सकता है. हालांकि अमेज़न पर संकट का धुंआ पहली बार नहीं घिरा है, यहाँ पर साल 1960 से जंगल को काटने की घटनाएं शुरू हुई, जमीन और संसाधनों की भूख और उन पर अधिपत्य ज़माने के लिए 70 और 80 के दशकों में जब अमेज़न के जंगलों (खासकर बोलिविया और पेरू) में बड़े किसानों और कार्पोरेट कंपनियों का दखल शुरू हुआ तो जंगलों का सफाया शुरू हो गया, जिन किसानों के पास कई हजारों हेक्टेयर जमीन थी उन्होंने वहां पर बड़े–बड़े रैन्चेस का निर्माण करने के लिए जंगलों को काटना शुरू किया और उसी के बीच में उन कार्पोरेट्स और बड़े किसानों का वहां की जनजातियों से संपर्क हुआ और टकराव की स्थिति उत्पन्न हुई जिसके कारण नरसंहार भी हुआ, जिसके कारण वहां की कई आदिम जनजातियाँ नष्ट भी हो गयी और 1990 के दशक में जंगलों की कटान का काम चरम पर पहुँच गया.

साल 1992 में अमेज़न के जंगलों में हो रहे नुकसान को लेकर ही रियो डे जेनेरियो में अर्थ समिट का आयोजन हुआ था, जिसमें ब्राज़ील की पूर्ववर्ती सरकार में पर्यावरण मंत्री रही यह बताती है कि वहां अवैध तरीके से पोर्ट का निर्माण किया जा रहा था और लगातार जंगलों को काटा जा रहा था इस पर हम लोगों ने रोक लगाईं पर जब कुछ NGO और वहां की जनजातियों ने अवैध तरीके से जंगलों को काटने को लेकर विरोध प्रदर्शन किया था तो उन लोगों के ऊपर गोली चलाई गयी और उनको मारा गया, लेकिन उसके बाद विश्व भर के देशों से दबाव पड़ने के बाद उन जनजातियों के अधिकारों को बचाने के लिए वहाँ की सरकार ने अलग से इंडीजीनस लोगों के अधिकार तय करने के लिए मिनिस्ट्री और एजेंसीज बनाई जो कि समय-समय पर उनकी समस्याओं को जाने और उन्हें हल करे.


ब्राज़ील में कई बड़ी नदियाँ हैं जिन पर बड़े सारे बाँध बनाये गए जिनके पीछे भी कई बड़े हिस्सों में जंगलों को काटा जाने लगा जिसके कारण नदी के किनारों के गाँव डूब गए लेकिन वहाँ पर रहने वाली जनजातियाँ हमेशा इसका विरोध करती रही है. अमेज़न के जंगलों के कबीलों के मुखिया हुआरेज़ मुंडुरुकू ये कहते है कि ‘हर बार सरकार बाँध बनाने को लेकर कोई न कोई झूठा वादा लेकर आती है लेकिन जहाँ पर ये बाँध बनाए गए वहां पर स्थानीय लोगों के लिए परेशानियां ही उत्पन्न हुयी है”. अमेज़न में लगी आग को लेकर बीबीसी की टीम जब वहां जायजा लेने पहुंची तो वहाँ के आदिवासियों के नेता रायमुंडो मुरा ने खुले शब्दों में कहा है कि “ यह एक तबाही है पर हम इसे बचाने के लिए कोई भी कुर्बानी देने को तैयार हैं”.


पूरे विश्व भर में ब्राज़ील के राष्ट्रपति बोल्सोनारो की आलोचना हो रही है, क्योंकि उन्होंने जब जनवरी में पद संभाला था तो चुनाव में होने वाले कैम्पेन में ही कहना शुरू कर दिया था कि हम अमेज़न को दुनिया भर के लिए खुला छोड़ देंगे ताकि वहां पर औद्योगिक क्षेत्र बसाए जा सके और खेती की जा सके इसके साथ ही हम वहाँ की जनजातियों को मुख्यधारा में लाने का प्रयास करेंगे, पर्यावरण के हितों की अनदेखी करने और अपने बयानों से चर्चा में रहने के कारण बोल्सोनारो की तुलना डोनाल्ड ट्रम्प से भी की जाती है, उन्हें ब्राज़ील में ट्रापिकल ट्रम्प की संज्ञा भी दी जाती है. पर्यावरणविद आंकड़ों के आधार पर ये दावा करते हैं कि बोल्सोनारो के राष्ट्रपति बनने के बाद से जंगल पर कब्ज़ा करने वाले बेख़ौफ़ हो गए हैं, वो जंगलों को काट रहे हैं और आग लगा रहे हैं, और इस बार आग लगने की घटनाओं में 85 % की वृद्धि हुई है.

नेशनल इंस्टीट्यूट फॉर स्पेस रिसर्च के अनुसार एक साल में लगभग 75,000 बार आग लग चुकी है, कई बड़े पत्रकार इस बात का दावा कर रहे हैं कि ब्राज़ील की मौजूदा सरकार की नज़र अमेज़न के जंगलों में पाए जाने वाले बेशकीमती खनिजों पर हैं.


कई NGO’S और मीडिया रिपोर्ट्स में इस तरह की बातें भी सामने आ रही है कि राष्ट्रपति ने अमेरिका और कनाडा की कई बड़ी कंपनियों से डील कर रखी है, इसीलिए वह अपने बेटे रोआद्रो बोल्सोनारो को अमेरिका में ब्राज़ील का राजदूत बनाना चाह रहे ताकि वो वहाँ की कंपनियों से लगातार संपर्क में बने रहे और उन कंपनियों को अमेज़न ला सके लेकिन राष्ट्रपति इन सब दावों से बेपरवाह दिखते हैं और वे अमेज़न की आग के लिए एन.जी .ओ. “ग्रीन ग्रुप्स” पर जंगल में आग लगाने का इल्जाम लगाया। NGO को दोषी ठहराते हुए यह कहते हैं कि “ये आग ‘ग्रीन ग्रुप्स’ ने लगाई है, क्योंकि उन्होंने धन की मांग की थी और सरकार ने उनकी मांग ठुकरा दी थी इसलिए वो सरेआम ब्राज़ील और सरकार को पूरे विश्व के सामने बदनाम कर रहे हैं” परन्तु ‘ग्रीन ग्रुप्स’ राष्ट्रपति के बयान को बेतुका बताते हुए कहते हैं कि “वहां पर जनजातियाँ है जिनके पास कोई व्यवसाय नहीं है, वो वहाँ पर जंगल को काटने और आग लगाने वाले गुटों को आग लगाने से रोकते हैं और अपनी जान को जोखिम में डालते हैं ताकि उनकी सभ्यता से जुडी चीज़े नष्ट न हो, यदि राष्ट्रपति ने हम पर आरोप लगाए हैं तो वह कोई सबूत क्यों नहीं पेश करते”. इसकी पहले की सरकार में पर्यावरण मंत्री रही मरीना सिल्वर कहती है कि “जब उनकी नीतियों की निंदा हुई तथा विश्व भर से दबाव डाला गया तब जाकर कहीं वे जांच कराने को मजबूर हुए हैं, यदि इस आग के पीछे NGO जिम्मेदार है तो अभी तक सरकार की तरफ से उन NGO’S के ख़िलाफ़ कोई कड़ा कदम क्यों नहीं उठाया गया? हालांकि अब ये सरकार भी मान चुकी है कि वहां जो लोग है वही ज़मीन को खेती करने और अवैध रूप से हथियानें के लिए जंगलों को काट रहे और उनमें आग लगा रहे हैं हालांकि जंगल की आग और कटान को देखते हुए सरकार ने अपनी सेना और एयरफोर्स को भी उन इलाकों में निगरानी हेतु तैनात कर दिया है.

दुनिया और ख़ास कर यूरोप के लोग बोल्सोनारो को ही इसके लिए जिम्मेदार बता रहे हैं, हालाँकि राष्ट्रपति खुद किसी भी तरह की जिम्मेदारी लेने से बच रहे है. बोल्सोनारो यह जानते हैं कि सीधे तौर पर न सही परन्तु अमेरिका का समर्थन उन्हें प्राप्त है, हालांकि चीन और भारत इस मसले पर अभी तक चुप है क्योंकि चीन और भारत ब्रिक्स में ब्राज़ील के साथी सदस्य हैं, लेकिन कई बड़े देश ऐसा मानते हैं कि इन दो उभरती महाशक्तियों को ऐसे मसले को लेकर ब्राज़ील पर दबाव बनाना चाहिए क्योंकि अमेज़न के जंगलों की आग केवल ब्राज़ील की समस्या नहीं है यह पूरे विश्व की समस्या है. ब्राज़ील की सरकार अमेज़न के जंगलों में होने वाली खेती में मॉडर्न तकनीकी को बढ़ावा दे रही है, इसके साथ ही सरकार जंगलों की सुरक्षा के लिए बनाये गए कानूनों को भी कमज़ोर करने की तैयारी में है, जिसके कारण यहाँ के किसान खुश है पर इससे ग्लोबल वार्मिंग के संकट से निपटने में प्रक्रिया को बड़ा झटका लगेगा. ब्राज़ील की सरकार का ये कहना है कि “सिर्फ ब्राज़ील ही यह तय कर सकता कि उसके जंगलों का क्या करना है ये फैसला लेने का हक किसी और को नही हैं” पर अमेज़न के जंगलों का सफाया कुछ यूँ है कि “हर मिनट एक फुटबाल ग्राउंड के बराबर जंगल काटे जा रहे है यानी कि रोजाना 2000 फ़ुटबाल ग्राउंड के बराबर जंगल स्वाहा...यह रफ़्तार प्रतिदिन और तेज़ होती जा रही है” पर सच यही कि अमेज़न के जंगलों को लगातार काटे जाने और आग लगने का असर पूरी दुनिया की जलवायु पर पड़ेगा.


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