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दिल्ली की आपा-धापी से दूर, शहर-ए- बनारस!

यात्रा वृतांत

कृष्ण मुरारी

अपने शहर से कहीं दूर किसी अनजान जगह,अनजाने लोगों के पास जाने की सोचना ही एक रोमांच लेकर आता है। जिंदगी जीने के कई तरीके होते हैं। एक, बस आप जीने के लिए जीते हैं। दूसरा, हर पल, हर लम्हे को आप जीना चाहते हैं। मैं जिंदगी को दूसरे वाले तरीके से जीना चाहता हूं।

       दिल्ली जैसे बड़े शहर की आपा-धापी से कहीं दूर, अपनों की तलाश में, सुकून की तलाश में, छोटे शहर को जानने-समझने और उसे जीने की तलाश में,अपने प्रेम की तलाश में निकल पाना आसान काम नहीं है। लेकिन दूसरी वाली जिंदगी जीनी तो थी - इसलिए हम निकल पड़े - पतली, संकरी और भीड़भाड़ वाली गलियों को छान मारने, पुराने बने मकानों की खूबसूरती देखने,गंगा की गोद में बैठे हुए शहर को अपनी आंखों में बसाने, जीवन के अंतिम सत्य मणिकर्णिका को जानने, बाबा के दर्शन करने, देवों की भूमि को नमन और उसकी कर वंदना करने - शहर-ए- बनारस की ओर।


शहर-ऐ- बनारस

          अपने चार साथियों के साथ नई दिल्ली रेलवे स्टेशन से हम निकल पड़े बनारस जाने वाली गाड़ी काशी विश्वनाथ एक्सप्रेस में। इस ट्रेन की एक खूबसूरती है कि यह उत्तर प्रदेश को जानने-समझने और ध्यान से देखने का समय देती है। बाकी आप खुद ही समझ जाइए। सफर में एक उत्साह था - नए शहर को देखने का,जिसके बारे में आप बचपन से खूब सुनते आए हैं, खूब पढ़ते आए हैं। लंबे सफर के बाद सुबह तड़के हम वाराणसी पहुंच चुके थे अपनी मंजिल पे।

       कहते हैं - तारीख अगर तय हो तो वह एक बार नहीं आती। वो आने से कई दिन पहले से आना शुरू कर देती है। हमारी तारीख आ चुकी थी और हम अपनी मंजिल पर भी पहुंच चुके थे। हल्के कोहरे और सुस्तायी हवा के बीच हम सुबह-सुबह अस्सी घाट पहुंच गए। इस घाट के बारे में काफी कुछ सुना और किताबों में पढ़ा था, लेकिन आज ये आंखों के सामने था। मेरी आंखें लगातार हर लम्हे को कैद करती जा रही थी। इतना शांत और स्थिर माहौल शायद इन आंखों ने कभी देखा ना था। समय जैसे रुक गया हो या यूं कहें कि मैं एक जगह स्थिर हो गया था। तभी एक चाय वाला आकर पूछता है - लेमन टी । यह सुनकर दिल खुश हो गया काफी दिन जो हो गए थे लेमन टी पीए हुए। चुस्कियों के बीच घाट,गंगा जी और यह पूरा शहर ही लगातार खूबसूरत होता जा रहा था। लौटने का मन तो नहीं था यहां से लेकिन लौटना जीवन की भयानक क्रियाओं में से एक है।

      अगली मंजिल थी - काशी हिंदू विश्वविद्यालय की। अभी भी लंका गेट नजरों के सामने है। गेट की भव्यता और पीले-लाल रंग से पटी दीवारें मुझे अपना बनाती जा रही थी। दिल महामना मालवीय जी को लगातार धन्यवाद देता जा रहा था।

      महिला महाविद्यालय, सुंदरलाल अस्पताल,रुइया छात्रावास, बिड़ला छात्रावास से होकर हम अपने ठिकाने राजा राममोहन राय छात्रावास पहुंच गए। होस्टल में रुकने का पहला अनुभव यहां होने वाला था। लेकिन अक्सर अनजाने जगहों पर आपको ज्यादा अपनापन मिलता है - यहां भी वही हुआ।

      सब कुछ पा लेने की चाह अक्सर अधूरापन छोड़ जाती है। बीएचयू कैंपस - एक साम्राज्य से कम नहीं है। मानो शहर के बीचोबीच एक और खूबसूरत शहर बसा हो। कैंपस घूमते हुए हम विश्वनाथ मंदिर पहुंचे। शहर के भीड़-भाड़ से दूर प्रेमी जोड़े अपनी जगह तलाश कर ही लेते हैं और मंदिर से अच्छी जगह और मिल भी कहा सकती है। खैर, अब हम वापस लौट चुके थे। नई ऊर्जा के साथ शाम को फिर शहर जो छान मारना था।

बनारस को घाटों का शहर कहते है। यहां का  अस्सी,तुलसी,होलकर, हरीशचंद्र, दशस्वमेध,              

मणिकर्णिका घाट ही इसकी पहचान है। यहां बैठना और एकाग्रचित्त से गंगा को देखना मन को तृप्त कर देता है। इसी अनुभव को जीना तो कई सालों से मैं चाहता था। यहाँ आकर लगा कि मैं अपने खुद से काफी करीब हूं। कोई संचालित करने वाला नहीं है। धीरे-धीरे मैं इस शहर के अनुकूल होता जा रहा था - एकदम शांत और स्थिर।

           शाम ढल चुकी थी। दशस्वमेध घाट की आरती देखकर हम निकल पड़े चाँद बाजार की तरफ। संकरी,पतली गलियों से पहला साक्षात्कार यहीं हुआ। भीड़ में एक दूसरे से टकराने के बावजूद मन छल्लाया नहीं। नई तलाश में कदम बढ़ते ही जा रहे थे - बिना थके, बिना रुके। रात होने को थी। हॉस्टल लौटना था - ताकि अगले दिन फिर एक सफर की ओर बढ़ा जा सके। 

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