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कांग्रेस के लिए कितनी क़ामयाब होंगी प्रियंका?

आदित्य जायसवाल

हर साल की तरह इस साल भी वसंत ऋतु की शुरुआत हो चुकी है. हल्की ठंड के साथ मीठी धूप सबको लुभा रही है. लेकिन 2019 की वसंत ऋतु में कुछ ख़ास है क्योंकि 2019 लोकसभा चुनाव का साल है. जी हां इस बार के वसंत में चुनाव भी घुल गया है. घर के अंदर-बाहर, गलियों में, चाय की टपरियों पर, बस-ट्रेन में, सब जगह चुनाव की ही बात हो रही है. भारत विविधताओं का देश है. यहां पर चुनाव को पर्व की तरह मनाया जाता है. चुनावी मौसम में युवाओं से लेकर वृद्धों तक, गृहणियों से दफ़्तर जाने वाले लोगों तक. सभी चुनावी विचारधारा में रम जाते हैं. यही है भारतीय संविधान की सम्मोहन शक्ति और ऐसा सिर्फ इसलिए होता है क्योंकि जनता का भारत के संविधान और चुनावी प्रक्रिया में पूरा विश्वास है.


लेकिन एक सवाल जो हर किसी के ज़हन में रहता है की कौन जीतेगा 2019 का आम चुनाव? किसे जनता अपने सिर आंखों पर बिठाएगी? कौन बनेगा भारत का सिरमौर? क्या सत्ता पर विराजमान भाजपा फिर से अपना कार्यकाल दोहरा पाएगी?

क्या फिर मुख्य विपक्षी पार्टी कांग्रेस को जनता दोबारा सत्ता में ले आएगी?

क्या एक अलग तरीके का समीकरण जिसे तीसरा मोर्चा या महागठबंधन कहा जा रहा है. वह बाजी मार ले जाएगा ?



INC

फिलहाल हम बात करेंगे मुख्य विपक्षी पार्टी कांग्रेस की आगामी चुनाव की भूमिका पर. 2014 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस अपने 10 साल के उपलब्धियों के साथ चुनावी मैदान में उतरी थी. कांग्रेस (यू पी ए) शासनकाल ने जब अपनी 10 साल की उपलब्धियों को गिनाना चाहा तब जनता ने भ्रष्टाचार, महंगाई को ज़्यादा तरजीह देते हुए भाजपा को एक तरफ़ा बहुमत देने का निर्णय लिया था. लेकिन कहते हैं राजनीति में कुछ भी निश्चित नहीं होता. समय के साथ राजनीतिक समीकरण भी बदलते हैं. इसी सोच के साथ कांग्रेस पार्टी भी इस चुनाव में अपने दावेदारी मज़बूती से पेश करने में जुट गई है.


यह चुनाव जितना ख़ास कांग्रेस पार्टी के लिए है, उससे कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण उनके राष्ट्रीय अध्यक्ष राहुल गांधी के लिए भी है, क्योंकि कांग्रेस के अध्यक्ष बनने बाद यह उनका पहला लोकसभा चुनाव है.


ऐसा इसलिए कहा जा रहा है क्योंकि उनका प्रदर्शन ही उनके राजनीतिक भविष्य को तय करेगा. संगठनात्मक तौर पर देखें तो राहुल के अध्यक्ष पद पर उनके प्रदर्शन का कोई ख़ास फर्क नहीं पड़ने वाला है, क्योंकि कांग्रेस की अगुवाई गांधी परिवार से इतर कोई करे ऐसी परंपरा है नहीं. लेकिन उनका प्रदर्शन यह तय करेगा कि आम जनमानस की उनके प्रति सोच क्या है?

आम जनता उन पर और उनके नेतृत्व पर कितना भरोसा करती है ?


Priyanka Gandhi Credits: India Today


आम चुनाव में उतरने से पहले कांग्रेस पार्टी ने प्रियंका गांधी वाड्रा के रूप में अपना ट्रंप कार्ड खेला है. वैसे प्रियंका पहले भी अप्रत्यक्ष तौर पर चुनावों में उतरती रही हैं. पार्टी का प्रचार-प्रसार करती रही हैं. लेकिन अब वह प्रत्यक्ष तौर पर चुनाव में उतर चुकी हैं. कांग्रेस पार्टी ने उन्हें अपना राष्ट्रीय महासचिव बना कर इसकी पुष्टि कर दी है. कल प्रियंका की लखनऊ में रोड शो और रैली थी. जगह-जगह पर नारे लग रहे थे, "चलेगी बदलाव की आंधी,आ गए हैं राहुल और प्रियंका गांधी". निश्चित तौर पर यह कहा जा सकता है कि प्रियंका के पार्टी में शामिल होने से कार्यकर्ताओं का उत्साह बढ़ा है.


काफी समय से कांग्रेसी कार्यकर्ताओं की यह मांग थी की प्रियंका को 'मेन स्ट्रीम' राजनीति में आना चाहिए. जिसको कांग्रेस ने समझा और अपने कार्यकर्ताओं को लखनऊ में तोहफ़ा दिया. कांग्रेसियों का कहना है कि प्रियंका, इंदिरा गांधी का प्रतिरूप हैं. वह सत्ताधारी दल को जड़ से उखाड़ फेकेंगी.


लेकिन क्या स्वयं कांग्रेस पार्टी को प्रियंका पर इतना भरोसा है, जितना वह जता रहे हैं. ऐसा इसलिए क्योंकि राष्ट्रीय महामंत्री होने के नाते प्रियंका को सिर्फ़ पूर्वी उत्तर प्रदेश का चुनावी संयोजक बनाया गया है. प्रियंका के आने से कार्यकर्ताओं का जो उत्साहवर्धन हुआ है वह वोटों में कितना तब्दील होता है यह तो आने वाला वक़्त ही बताएगा.


जहां तक बात है कांग्रेस पार्टी के मजबूत होने की तो पिछले 5 वर्षों में हुए विधानसभा चुनाव की हार ने यह साबित किया है कि कांग्रेस पार्टी पर जनता का विश्वास कम हुआ है. हाल ही में हुए मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान के चुनाव को छोड़ दिया जाए तो बीते सभी चुनाव में कांग्रेस पार्टी की हार हुई है. कांग्रेस पार्टी की कमज़ोरी इस बात से भी साबित होती है की वह अपनी पार्टी को मज़बूत करने के बजाय अपने गठबंधन को मज़बूत करने में लगी हुई है. उसकी पूरी रणनीति गठबंधन आधारित है. कांग्रेस पार्टी महीनों से महागठबंधन की रूपरेखा बनाने में लगी हुई है लेकिन सपा, बसपा और तृणमूल जैसे बड़े क्षेत्रीय दल कांग्रेस पार्टी के नेतृत्व को अपनाएंगे, इसमें अभी संदेह है.

सपा बसपा ने जिस तरह अपने गठबंधन से कांग्रेस को दरकिनार किया है उससे तो यही संदेश मिलता है कि उत्तर प्रदेश के राजनीतिक दल कांग्रेस को साथ लेकर नहीं चलना चाहते हैं।

महागठबंधन में कांग्रेस पार्टी का सबसे बड़ा रोड़ा बन कर सामने आई है तृणमूल कांग्रेस. ममता बनर्जी ने समय-समय पर विभिन्न माध्यमों से अपने प्रधानमंत्री बनने की दिली इच्छा को जग ज़ाहिर किया है. इससे निपटने में कांग्रेस पार्टी असफल दिख रही है. हाल ही में ममता बनर्जी के सीबीआई के खिलाफ धरना प्रदर्शन में विभिन्न राज्यों के मुख्यमंत्रियों ने उनके साथ मंच साझा किया लेकिन राहुल गांधी इस मंच का हिस्सा नहीं बने. उन्होंने बस कॉल करके और ट्विटर पर ममता को अपना समर्थन दिया था. महागठबंधन भी कांग्रेस के लिए एक बड़ी कसौटी है जिस पर वह कितनी खरी उतरेगी इसका फैसला तो जनता चुनाव में तय करेगी.


भारत की सबसे पुरानी और मुख्य विपक्षी पार्टी. जिसके पास सोनिया गांधी, राहुल गांधी और प्रियंका गांधी वाड्रा जैसे बड़े नाम है. उसका चुनाव में कैसा प्रदर्शन होगा यह देखने लायक होगा.



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