• Vishwajeet Maurya

25 जून 1975 को जब रेडियो पर एक आवाज आई भाइयों और बहनों, राष्ट्रपति जी ने आपातकाल की घोषणा की है...

इतिहास में 25 जून का दिन भारत के लिहाज से एक महत्वपूर्ण घटना का गवाह रहा है. रेडियो पर एक आवाज आई भाइयों और बहनों, राष्ट्रपति जी ने आपातकाल की घोषणा की है।... बस, उस दिन से 25 जून 1975 की तारीख इतिहास के पन्नों में काले धब्बे की तरह शुमार कर दिया गया। उस समय आकाशवाणी ने रात के अपने एक समाचार बुलेटिन में यह प्रसारित किया कि अनियंत्रित आंतरिक स्थितियों के कारण सरकार ने पूरे देश में आपातकाल (इमरजेंसी) की घोषणा कर दी गई है, आकाशवाणी पर प्रसारित अपने संदेश में इंदिरा गांधी ने कहा था, 'जब से मैंने आम आदमी और देश की महिलाओं के फायदे के लिए कुछ प्रगतिशील कदम उठाए हैं, तभी से मेरे खिलाफ गहरी साजिश रची जा रही थी। 26 जून 1975 से 21 मार्च 1977 तक की 21 महीने की अवधि में भारत में आपातकाल था.

आपातकाल का फैसला एक फिल्म सरीखा था जिसकी स्क्रिप्ट काफी पहले लिख दी गयी थी...

लोकसभा चुनाव में इंदिरा गांधी के सामने हारे राज नारायण ने इलाहाबाद हाईकोर्ट में 1971 में केस दाखिल कर चुनाव में सरकारी मशीनरी के दुरुपयोग का आरोप लगाया था. शांतिभूषण ने नारायण के लिए केस लड़ा और हाई कोर्ट ने इंदिरा गांधी को दोषी करार दिया. हाईकोर्ट ने फैसले में कहा कि गांधी की लोकसभा सदस्यता खत्म की जाए और छह सालों तक चुनाव लड़ने के लिए वो अयोग्य मानी जाएं. इसके बाद गांधी ने हाई कोर्ट के इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने इस फैसले को सही माना और गांधी की अपील पर सुनवाई पूरी होने तक उन्हें प्रधानमंत्री बने रहने की इजाज़त दे दी. ये 24 जून 1975 को हुआ और अगले ही दिन मोरारजी देसाई और जेपी ने सरकार के खिलाफ फिर बड़ा मोर्चा खोल दिया.

अमरीकी लेखिका कैथरीन फ्रैंक ने अपनी किताब "इंदिरा: द लाईफ ऑफ इंदिरा नेहरु गांधी" आपातकाल के सन्दर्भ में कई सारी बातें लिखी है, जिनमें से वो इस बात का जिक्र करती है की दरअसल इंदिरा गाँधी को डर सता रहा था कि कहीं वे सत्ता को अपने हांथों से गवां न दें, किताब में पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री रहे सिद्धार्थ शंकर रे के बारे में कहा जाता है कि उन्होंने ही विरोधियों के सुरों को दबाने के लिए इंदिरा गांधी को इमरजेंसी लगाने का आइडिया दिया था. रे ने ही संविधान संशोधन कर पूर्ण सत्ता पा लेने का रास्ता भी सुझाया था. आरके धवन (इंदिरा गाँधी के सचिव) ने रे को लेकर ये बातें कही थीं. 25 जून की सुबह को पश्चिम बंगाल के तत्कालीन मुख्यमंत्री सिद्धार्थ शंकर रे के पास इंदिरा गांधी के सचिव आरके धवन का फोन जाता है. आमतौर पर सिद्धार्थ शंकर रे कलकत्ता के बजाय दिल्ली में ही रहते थे. धवन ने रे से कहा कि वे जल्दी से प्रधानमंत्री आवास पर पहुचें. उस समय प्रधानमंत्री आवास 1 सफदरजंग रोड हुआ करता था. सिद्धार्थ शंकर रे तुरंत जा कर इंदिरा गांधी से मिलते हैं और लगभग दो घंटे लगातार दोनों की बात चलती है. इंदिरा ने रे से कहा कि उन्हें ऐसा लगता है कि देश में अराजक माहौल आने वाला है. हम एक बहुत बड़ी समस्या में हैं और इससे निपटने लिए कोई बड़ा कदम उठाना होगा. इंदिरा ने कहा कि गुजरात विधानसभा भंग कर दी गई है. बिहार विधानसभा भंग हो गई है. इसका कोई अंत नहीं है. लोकतंत्र खतरे में है. इंदिरा ने इस बात को दोहराया कि कुछ "कठोर, जरुरी कार्रवाई की जरूरत है." इंदिरा गांधी को इंटेलिजेंस एजेंसियों के जरिए लगातार ये जानकारी दी जा रही थी कि देश के किस कोने में कौन सा नेता उनके खिलाफ रैली कर रहा है. उस दिन इंदिरा ने रे के सामने जयप्रकाश नारायण के एक रैली, जो कि शाम में होने वाली थी, का जिक्र करते हुए कहा कि वे अपने रैली से पुलिस और आर्मी को हथियार छोड़ने की बात करने वाले हैं. इंदिरा व्यक्तिगत रूप से डर रहीं थीं. उन्हें लगता था कि अगर जयप्रकाश नारायण उनके खिलाफ लोगों को खड़ा करने में कामयाब हो गए तो ये देश के लिए विध्वंसक होगा. इंदिरा को लगता था कि अगर वे सत्ता छोड़ती हैं तो भारत बर्बाद हो जाएगा.

जब इंदिरा ने देश को बताया 'शॉक ट्रीटमेंट' के बारे में...

इंदिरा ने सिद्धार्थ शंकर रे से कहा, "जब एक बच्चा पैदा होता है तो ये देखने के लिए कि बच्चा ठीक है या नहीं, हम उसे हिलाते हैं. भारत को भी इसी तरह हिलाने की जरूरत है." बाद में एक इंटरव्यू में इंदिरा ने कहा था कि देश को बचाए रखने के लिए 'शॉक ट्रीटमेंट' की जरूरत थी. इंदिरा ने रे को इसलिए बुलाया था क्योंकि वे संवैधानिक मामलों के जानकार थे. हालांकि उस दिन इंदिरा गांधी ने कानून मंत्री एचआर गोखले से कोई सलाह नहीं ली थी. दरअसल उस समय इंदिरा गांधी कोई सलाह नहीं लेना चाहती थीं. उन्हें अपने फैसले को लेकर इजाजत की जरूरत थी.

तैयार हो रही थी गिरफ्तारी की लिस्ट

इस मामले में एक दिन पहले ही संजय गांधी, गृह मंत्रालय के दूसरे सबसे प्रभावशाली व्यक्ति ओम मेहता और हरियाणा के मुख्यमंत्री बंसीलाल ने इसकी शुरूआत कर दी थी. इतना ही नहीं सिद्धार्थ शंकर रे के बुलाने से पहले ही ये तीनों लोग आरके धवन के ऑफिस में ऐसे लोगों की लिस्ट तैयार कर रहे थे जिन्हें गिरफ्तार किया जाना था. इस लिस्ट में सबसे उपर जयप्रकाश नारायण और मोरारजी देसाई थे. सिद्धार्थ शंकर रे ही वो शख्स थे जिन्होंने राजनारायण मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट का फैसला आने के बाद इंदिरा गांधी से कहा था कि वो इस्तीफा न दें. रे कानूनी मामलों के बड़े जानकार थे लेकिन रे संजय गांधी के करीबी भी थे. उस दिन जब इंदिरा ने रे से पूछा कि हमें क्या करना चाहिए. उन्होंने कहा कि मुझे संवैधानिक स्थिति को देखना पड़ेगा. इसके बाद रे वहां से चले जाते हैं और भारत ही नहीं बल्कि अमेरिका के संविधान को पढ़ने में घंटों समय बिताते हैं. इसके बाद वो इंदिरा के घर पर शाम 3.30 बजे आए और उन्होंने इंदिरा गांधी को बताया कि संविधान के अनुच्छेद- 352 के तहत देश में इमरजेंसी लगाई जा सकती है. संविधान में ये व्यवस्था दी गई है कि बाहरी आक्रमण और आंतरिक डिस्टरबेंस या सशस्त्र संघर्ष की स्थिति में इमरजेंसी लगाई जा सकती है. रे को दोनों स्थितियों का अंतर बखूबी पता था. उन्हें ये पता था कि इस बार इमरजेंसी लगाने के लिए बाहरी आक्रमण का वजह नहीं बताया जा सकता है. रे ने 'सशस्त्र संघर्ष' का मतलब राज्य में आंतरिक कलह के रुप में निकाला. इस तरह रे और इंदिरा का मानना ये था कि जयप्रकाश नारायण ने जो आर्मी और पुलिस को सरकार के आदेश नहीं मानने की बात कही है वो सशस्त्र संघर्ष के दायरे में आता है. रे ने इंदिरा गांधी को आंतरिक और बाह्य इमरजेंसी के बारे में पूरे डिटेल में बताया था. इसके बाद इंदिरा ने रे से कहा कि वो इमरजेंसी लगने के बारे में कैबिनेट से बात नहीं करना चाहती हैं. रे ने इसका भी हल निकाल लिया था. उन्होंने इंदिरा से कहा कि जब वे राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद के सामने ये बात करें तो वो ये कह सकती हैं कि इसके लिए कैबिनेट से बात करने का समय नहीं था.

जब राष्ट्रपति ने इंदिरा से कहा- इमरजेंसी ऑर्डर भेज दें

इसके बाद इंदिरा गांधी ने कहा कि वे इस बात को लेकर राष्ट्रपति के पास जाएं. हालांकि रे ने इस बात को मानने से मना कर दिया. उन्होंने कहा कि वे एक पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री हैं, प्रधानमंत्री नहीं. हालांकि रे इंदिरा गांधी के साथ राष्ट्रपति से मिलने गए थे. इंदिरा गांधी 5.30 बजे राष्ट्रपति भवन पहुंची. फखरूद्दीन अली अहमद इंदिरा के मुताबिक उनके वफादार साबित हुए. इंदिरा ने फखरूद्दीन का नाम बतौर राष्ट्रपति पद के लिए सिफारिश की थी. इंदिरा और रे ने कुछ देर राष्ट्रपति को इमरजेंसी की जरूरत को और अनुच्छेद 352 के बार में समझाया. राष्ट्रपति ने जब पूछा कि क्या कैबिनेट से इस बारे में बात की गई है तो इंदिरा ने कहा कि ये मामला अति आवश्यक था और कैबिनेट बाद में इस पर सहमति दे सकता है. कुछ और सवाल पूछने के बाद राष्ट्रपति ने इंदिरा से कहा कि वे इमरजेंसी ऑर्डर भेज दें. हालांकि बाद में इंदिरा ने ये तर्क दिया था कि कानून व्यवस्था को बनाए रखने के लिए वो कैबिनेट की राय नहीं ली. उन्होंने कहा कि वे ये निर्णय बेहद गोपनीय रखना चाहती थीं और इसे लेकर विपक्ष को चौंकाना चाहती थीं. उस रात सिद्धार्थ शंकर रे प्रधानमंत्री आवास पर ही रुके थे. उन्होंने रात में ही इंदिरा गांधी की वो स्पीच तैयार करवाई थी जो कि सुबह उन्होंने देश के नाम संबोधित किया था. वहीं दूसरी तरफ संजय गांधी और ओम मेहता उन नेताओं की सूची तैयार कर रहे थे जिन्हें सुबह गिरफ्तार किया जाना था.

इन सभी नेताओं को सुबह मीसा (मेंटीनेंस ऑफ इंटरनल सिक्योरिटी एक्ट) के तहत गिरफ्तार किया जाना था. खास बात ये है कि ये लिस्ट इमरजेंसी लागू करने के फैसले से पहले ही तैयार की जा रही थी. देर रात तक देश में इमरजेंसी लागू कर दी गई. पुलिस देश के कोने-कोने में विपक्ष के नेताओं और प्रदर्शनकारियों को जगाकर उन्हें गिरफ्तार करना शुरू कर दिया . जयप्रकाश नारायण, मोरारजी देसाई और राज नारायण जैसे लोगों को उसी रात गिरफ्तार किया गया. उसी रात दिल्ली के अखबारों के प्रिट्रिंग प्रेस की लाइने काट दी गईं. अगले दिन सुबह में सिर्फ स्टेट्समैन और हिंदुस्तान टाइम्स अखबार ही बाजारों में दिखाई दे रहे थे क्योंकि इन अखबारों के प्रिंटिंग प्रेस में बिजली नई दिल्ली से आती थी, दिल्ली नगरनिगम से नहीं. अफरा-तफरी में एक के बाद एक फैसले लिए जा रहे थे, उससे ज़्यादा जल्दबाज़ी में उनका क्रियान्वयन हो रहा था. सही-गलत सोचने से अधिक ज़ोर इस बात पर था कि विरोध का हर स्वर या हर लिखी गई पंक्ति अपना असर ना कर सके.

इंदिरा गांधी उस संबोधन में खुद को प्रधानमंत्री रहने या ना रहने को महत्वहीन बताती हैं. वो प्रधानमंत्री संस्था को महत्वपूर्ण बताते हुए समझा रही हैं कि उसकी गरिमा को कम करने का राजनीतिक प्रयास प्रजातंत्र या राष्ट्र के हित में नहीं है. ‘राष्ट्र की अखंडता ठोस कार्रवाई की मांग करती है.‘ इस कथन के साथ पक्के इरादों वाली इंदिरा गांधी ने बता दिया कि वो जिस ओर बढ़ चली हैं अब हटनेवाली नहीं हैं.


-Govind Pratap Singh

0 views

©Newziya 2019, New Delhi.