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इलाहाबाद की वो रंगकर्म कलाकार जिनसे मिलने के लिए फैज़ अहमद फैज़ ने अपनी ट्रेन लेट करवाई!

दिन था 25 अप्रैल 1981, डी पी त्रिपाठी ने मशहूर सीनेट हाल में एक मुशायरे का आयोजन करवाया था,


DP Tripathi

वही डी पी त्रिपाठी जो JNU के छात्रसंघ अध्यक्ष रहे फिर बाद में इलाहाबाद विश्वविद्यालय में पोलिटिकल साइंस के प्रोफेसर हो गए, भारतीय राजनीति में जाना था तो पॉलिटिक्स पढ़ाना छोड़ दिया और कांग्रेस पार्टी ज्वाइन कर ली, बाद में विवादों के चलते कांग्रेस छोड़ दिया और शरद पवार के साथ मिल के एनसीपी की स्थापना की,


Faiz Ahmed Faiz

अब आते है मुशायरे पे, मुशायरे की सदारत कर रहे थे मशहूर लेखक रविंद्र कलिया, अध्यक्ष थी महादेवी वर्मा, बगल में बैठे थे बीमार फ़िराक गोरखपुरी साहब और मंच की शोभा बढ़ा रहे थे फैज़ अहमद फैज़, फैज़ साहब ने कहा मंच से की "मेरा दुनिया को बस एक ही सन्देश है, बस इश्क़ करिये", यह सुन के फ़िराक साहब एक टक फैज़ को देखने लगे तभी मंच पर मौजूद डॉ. मोहम्मद हसन ने फ़िराक साहब का वो मशहूर मिसरा पढ़ दिया-


''आने वाली नस्लें तुम पर रश्क करेंगी हमअसरों

जब उनको ये ध्यान आएगा तुमने फ़िराक को देखा है.''


और फैज़ साहब ने तुरंत ही मिसरे की तरमीम करते हुए कहा-


"आने वाली नस्लें आप पर रश्क करेंगी जब उन्हें पता चलेगा कि

आपने फ़ैज़, फ़िराक और महादेवी को एक ही मंच पर देखा था.''


Faiz and Firaaq

अगले ही दिन फैज़ का एक कार्यक्रम था इलाहाबाद के हिंदी अकादमी में, एक 22 साल की छात्रा शुभा गुप्ता को फैज़ की हीं ग़ज़ल "शामें फ़िराक अब ना पूछ" गा रही थी, शुभा के गुरु रामाश्रय झा थे, बिना बताये उस दिन सुबह अपनी मोपेड लेके शुभा के घर पहुंच गए थे और कहा था की तुम्हे फैज़ की ग़ज़ल गानी है, शुभा हिचकिचाई लेकिन फिर पूरी ग़ज़ल कागज़ पर लिख के अपने गुरु के साथ चल दीं, ग़ज़ल पूरी हुई और फैज़ आये, उन्होंने शुभा से पूछा इस कागज़ में क्या है तो शुभा ने वो कागज़ दिखाया तो फैज़ आश्चर्यचकित रह गए और बोले "तुम्हे उर्दू नहीं आती" तो हिचकिचाती हुई शुभा ने कहा की अभी कुछ दिन में सीख लुंगी, फैज़ ने तारीफ की और उसी कागज़ पे ऑटोग्राफ देकर चल दिए. आज हम सब उसी शुभा को शुभा मुद्गल के नाम से जानते है जिन्होंने 'अली मोरे अंगना' गाना गया है.


Shubha Mudgal

इसी दिन वापस निकलना था फैज़ साहब को दिल्ली, रात की साढ़े 10 की ट्रेन थी और तभी अचानक से फैज़ साहब को याद आया की उनको सादिका शरण से मिलना है और उन्होंने डी पी त्रिपाठी से कहा की "मेरी ट्रेन 1:30 घंटे लेट करा दो बरखुद्दार मुझे सादिका शरण से मिलना है".


हमने बहुत जानने की कोशिश की, बहुत खोज करने के बाद इलाहाबाद के एक मशहूर रंगकर्मी और पत्रकार अजामिल जी ने सादिका के बारे में कुछ यूँ बताया-

"सादिका शरण जिस समय इलाहाबाद के रंग चौखट पर चमक रही थी उस समय मैं इलाहाबाद के रंगमंच का हिस्सा नहीं था, मैं एक दर्शक था वह उस दौर के तमाम नाटकों में प्रमुख भूमिका निभाती थी बहुत अच्छी अभिनेत्री थी और अपनी भूमिकाओं को जीवंत कर देती थी बड़े परिवार से होने के कारण उनका चयन भी नाटकों के लिए हो जाया करता था बहुत सुंदर थी बेहद विनम्र और हंसमुख, नाटक के बाद वे स्वयं दर्शकों के बीच आती थी और उनका धन्यवाद करती थी. राजस्थान की प्रमुख अभिनेत्री रही है उस दौर में महिलाओं को रंग मंच पर लाना बहुत दुष्कर कार्य था लेकिन इन्हें सहज उपलब्धता के कारण भी रंगमंच पर स्वीकार किया जाता था. इलाहाबाद का बुद्धिजीवी समाज इनके परिवार से जुड़ा हुआ था और उनका बहुत सम्मान करता था मेरे लिए यह एक अभिनेत्री थी और उससे ज्यादा कुछ नहीं इनका ग्लैमर एक सामान्य दर्शक की तरह ही मुझे भी आकर्षित करता था इनके नाटकों में बहुत बार इनकी भूमिका से ज्यादा लोग इन्हें देखने के लिए आते थे, अखबार इनकी तस्वीरें छापा करते थे इन्होंने बहुत सी ऐसी भूमिकाएं भी मंच पर निभाई थी जिसके बारे में उस दौर में महिलाओं से उम्मीद नहीं की जाती थी,मैं खुश होकर सिर्फ इतना कह सकता हूं कि मैंने उन्हें देखा है"


फैज़ साहब की जिद्द को डी पी त्रिपाठी ठुकरा ना पाए और कुछ छात्रों के साथ सीधे इलाहाबाद जंक्शन पहुंचे, और स्टेशन मास्टर से कहा की क्या ट्रेन लेट कराई जा सकती है, पर स्टेशन मास्टर बड़ी मिन्नतों बाद भी ना मानें, तब थक-हार कर डी पी त्रिपाठी ने कहा की अगर आप ट्रेन नहीं लेट करेंगे तो हम सब छात्र यही ट्रेन की पटरियों पर लेट जाएंगे और ट्रेन नहीं जाने देंगे, छात्रो की जिद्द के आगे स्टेशन मास्टर को झुकना पड़ा और फैज़ साहब की जो ट्रेन 10:30 पे आयी हुई थी वो 12 बजे रवाना हुई.


अतीत में ना जानें कितने मशहूर लोगों के कितने किस्से है इसी तरह के और किस्से न्यूज़िया आप तक लाता रहेगा.

इस लेख के लिए काफी जानकारियां डी पी त्रिपाठी की किताब "Remembering Faiz" से ली गयी है।

©Newziya 2019, New Delhi.