• Vishwajeet Maurya

सोशल मीडिया पर कोरोना वायरस की वैक्सीन के बारे में किए जा रहे झूठे दावों की पूरी पड़ताल

सोशल मीडिया अगर किसी मामले में लाभदायक है तो कई सारे मामलों में यह गलत व भ्रामक सूचनाओं का प्रचारक भी. सोशल मीडिया पर इन दिनों एक वीडियो खूब चल रहा है जो कथित तौर पर ऑस्टिओपैथ कैरी मडेज का बताया जा रहा है. इसमें कोरोना वायरस के वैक्सीन से जुड़े ग़लत दावे किए गए हैं.

-Govind Pratap Singh

Photo: Dr. Carrie Madej

इस वीडियो में दावा किया गया है कि "कोविड-19 का वैक्सीन इस तरह से बनाया जा रहा है जो हमें आनुवांशिक तौर पर बदल देगा. वहीँ वो बिना किसी प्रमाण के यह भी दावा करती हैं कि वैक्सीन हमें किसी आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के इंटरफेस से भी जोड़ देगा."


जब ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी की ओर से किए जा रहे वैक्सीन ट्रायल के शुरुआती नतीजों की ख़बर सोमवार को प्रकाशित हुई तो कई फेसबुक ग्रुप में कोरोना वायरस के वैक्सीन को लेकर बहस शुरू हो गई. बात यह भी उठी की वैक्सीन को विकसित करने की जल्दबाजी की वजह से इसके सुरक्षित होने को लेकर आशंकाए हो सकती हैं!


ऑक्सफोर्ड वैक्सीन ग्रुप के प्रमुख प्रोफे़सर एंड्रयू पोलार्ड ने बताया सच

वैक्सीन के बारे में प्रचारित हो रही सभी झूठी जानकारियों का खंडन करते हुए ऑक्सफोर्ड वैक्सीन ग्रुप के प्रमुख प्रोफे़सर एंड्रयू पोलार्ड ने बीबीसी से की गयी बातचीत में बताया कि “वैक्सीन के ट्रायल से संबंधित सभी सुरक्षा प्रक्रियाओं को अपनाया जा रहा है. जिन देशों में वैक्सीन के ट्रायल हो रहे हैं, वहाँ नियामकों के सुरक्षा रिपोर्ट्स का भी ख्याल रखा जा रहा है.”


ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय द्वारा प्रस्तुत परिणामों के अनुसार, उनका टीका ‘एस्ट्राज़ेनेका’ टी-कोशिकाओं (T-CELLS) की मदद से SARS-coV-2 वायरस के खिलाफ प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया को ट्रिगर करेंगे। इसके अलावा, शोधकर्ताओं ने कहा है कि टीके को व्यापक परीक्षणों से गुजरना होगा और व्यापक सार्वजनिक उपयोग होने से पहले इसकी एक श्रृंखला की जाँच होगी.


पहले दो चरण का ट्रायल तेज़ी से इसलिए हो सका क्योंकि कोरोना वायरस की वैक्सीन पर ऑक्सफोर्ड में पहले से कई काम हो चुके थे.


वैक्सीन की ज़रूरत को देखते हुए प्रशासनिक और फंडिंग के स्तर पर तेज़ी से काम हो सका और वॉलेंटियर खोजने में भी ज्यादा वक्त नहीं देना पड़ा.


प्रोफेसर पोलार्ड कहते हैं कि ट्रायल जब तीसरे चरण में पहुँचेगा तब साइड इफ़ेक्ट की पड़ताल करने के लिए हज़ारों वॉलेंटियर की जरूरत पड़ेगी.


पहले दो चरण में कोई ख़तरनाक साइड इफ़ेक्ट देखने को नहीं मिला है. जिन लोगों पर वैक्सीन का ट्रायल हुआ है, उसमें से करीब 16-18 प्रतिशत में सिर्फ़ मामूली बुखार देखने को मिला है.


शोधकर्ताओं का कहना है कि इस साइड इफ़ेक्ट को पैरासेटामॉल की मदद से ठीक किया जा सकता है. जब ऑक्सफोर्ड में चल रहे वैक्सीन ट्रायल की शुरुआत हुई थी तब यह दावा किया गया था कि पहला वॉलिंटियर ट्रायल के दौरान मर गया है.


लेकिन तब इस दावे को बीबीसी मेडिकल संवाददाता फ़र्गुस वाल्श ने उस वॉलिंटियर का इंटरव्यू कर के तत्काल खारिज किया था.


दुनिया भर के वैज्ञानिक कोरोना की वैक्सीन पर काम कर रहें हैं ताकि कोरोना के प्रसार को रोका जा सके. दुनिया भर में लाखों लोगों को मौत की नींद सुला देने वाले इस वायरस से अमेरिका से लेकर ऑस्ट्रेलिया तक, शायद ही कोई बड़ा देश बचा हो जो कोरोनावायरस से प्रभावित न हो. वहीं इसके प्रकोप के बाद से, सोशल मीडिया पर भ्रामक व गलत जानकारी भी लगातार बढ़ रही है.


बिल गेट्स के द्वारा अप्रैल में दिए गए इंटरव्यू में माइक्रोसॉफ्ट के सह-संस्थापक बिल गेट्स ने कहा था कि, वैक्सीन लेने के बाद लगभग 7,000,000 लोगों में वैक्सीन के साइड इफेक्ट्स हो सकते हैं!

लेकिन कुछ पोस्ट्स ने गेट्स के बयान को तोड़-मरोड़ कर कहा गया कि “कोविड-19 वैक्सीन लेने के बाद लगभग 7,000,000 लोग मर जाएंगे.


इस सबके बाद बिल और मेलिंडा गेट्स फाउंडेशन ने एक बयान में कहा है कि, “वैज्ञानिकों के सबूत बताते हैं कि टीके सुरक्षित हैं और उनके पास बीमारियों को रोकने का एक प्रमाणित रिकॉर्ड है.

“विशेषज्ञों का मानना ​​है कि कोविड-19 के लिए एक टीका इस महामारी को समाप्त करने के लिए महत्वपूर्ण होगा, क्योंकि क्लीनिकल ट्रायल से पता चलता हैं कि वे लोगों के व्यापक समूह में प्रयोग में लाने हेतु सुरक्षित और प्रभावी हैं.”


सोशल मीडिया पर कुछ पोस्ट में कहा गया है कि अरबपति बिल गेट्स कोविड-19 वैक्सीन के माध्यम से लोगों में माइक्रोचिप लगाने की योजना बना रहे हैं. हालांकि सबसे पहले इस थ्योरी को मई में रूसी कम्युनिस्ट पार्टी के गेन्नेडी ज़ुगानोव ने जन्म दिया.


उन्होंने अपने एक कॉलम में, पूंजीगत वैश्विकता पर हमला और दावा करते हुए लिखा कि अनिवार्य टीकाकरण योजना “हर इंसान में चिप को प्रत्यारोपित करने के लिए तथाकथित वैश्विकवादियों द्वारा एक चाल है ताकि उनकी गतिविधियों पर नजर रखी जा सके.”


Photo: AFP

गेट्स और उनके और उनकी पत्नी मेलिंडा के नेतृत्व में एक फाउंडेशन कोविड-19 के लिए एक टीका बनाने के लिए काम कर रहा है. फरवरी में, फाउंडेशन ने घोषणा की थी कि वह टीका अनुसंधान और उपचार के प्रयासों में 100 मिलियन यूएस $ का दान कर रहा है.


‘मीम’ से भी स्पेनिश फ्लू व वैक्सीन को लेकर फैलाई जा रही गलत जानकारी

1918 में आए स्पेनिश फ़्लू में वैक्सीन की वजह से पांच करोड़ लोगों के मरने से जुड़ा मीम सोशल मीडिया पर इन दिनों छाया हुआ है जो कि पूरी तरह से एक ग़लत जानकारी है.


Photo: BBC

सच यह है कि उस वक्त स्पेनिश फ़्लू से लोगों के मरने के दो कारण थे. एक तो फ़्लू के संक्रमण से और दूसरा संक्रमण के दौरान इम्यून सिस्टम पर अत्यधित जोर पड़ने से फेफड़ों में पानी भरने से.


यूएस सेंटर्स सेंटर फॉर डिजीज कंट्रोल ने इसे "हाल के इतिहास में सबसे गंभीर महामारी" कहा है, लेकिन यह भी कहा कि उस समय कोई टीका था ही नहीं, जिसके कारण इतनी बड़ी संख्या में मौतें हुई.

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