• Vishwajeet Maurya

हिंदी साहित्य और इसके प्रेमियों के लिए आज एक अतिमहत्वपूर्ण स्मृति-दिवस है।

हिंदी साहित्य और इसके प्रेमियों के लिए आज एक अतिमहत्वपूर्ण स्मृति-दिवस है। आज (21 जून) ही के दिन 'आवारा मसीहा' के ख्यात लेखक विष्णु प्रभाकर का जन्म उत्तर प्रदेश के जिला मुजफ्फरनगर स्थित मीरापुर में हुआ था। विष्णु प्रभाकर हिन्दी गद्य साहित्य में एक ऐसा नाम है, जो अपनी कालजयी रचनाओं से सुधि पाठकों, समालोचकों व साहित्य-साधकों के मानस-पटल पर अपनी छाप निरन्तर अंकित करते रहे। उनका बचपन विपन्नता में बीता। घर की आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं थी। उन्हें काफ़ी कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। वह ठीक से स्कूली शिक्षा भी नहीं ले सके। हालात ही व्यक्ति को कमजोर या मजबूत बना देते हैं। विष्णु प्रभाकर ने घर की परेशानियों और ज़िम्मेदारियों के बोझ से स्वयं को मज़बूत बना लिया। बड़े होने पर वह चतुर्थ श्रेणी की एक सरकारी नौकरी करने लगे। उससे उन्हें मात्र 18 रुपये प्रतिमाह वेतन मिल जाता था। इसी दौरान उन्होंने सतत स्वाध्याय से कई डिग्रियाँ के साथ उच्च शिक्षा प्राप्त की, तथा अपने घर-परिवार की ज़िम्मेदारियों को पूरी तरह निभाया। प्रेमचंद, यशपाल और अज्ञेय जैसे समर्थ साहित्यकारों की संगत में पहुंचे। सन् 1931 में 'हिन्दी मिलाप' में उनकी पहली कहानी दीवाली के दिन छपने के साथ ही उनके लेखन का जो सिलसिला शुरू हुआ, वह जीवनपर्यंत निरंतर चलता रहा। नाथूराम शर्मा प्रेम के कहने पर वह शरतचन्द्र की जीवनी 'आवारा मसीहा' लिखने के लिए प्रेरित हुए। शरतचन्द्र के बारे में जानकारियां जुटाने के लिए वह लगभग सभी स्रोतों और जगहों तक पहुंचे। यहां तक कि इसी बहाने उन्होंने बांग्ला भाषा भी सीख ली। जब 'आवारा मसीहा' का प्रकाशन हुआ, हिंदी साहित्य में उसकी धूम मच गई। बांग्ला के प्रतिष्ठित उपन्यासकार शरतचंद्र के जीवन चरित के रूप में 'आवारा मसीहा' ख्यात साहित्यकार विष्णु प्रभाकर की वह खोजपरक कृति है, जिसने विष्णु प्रभाकर को हिंदी साहित्य में अमर कर दिया . कई बार हमें अपने स्वभाव से बिलकुल विपरीत चीजें भली लगती हैं. वे हमें अपनी तरफ चुम्बकीय आकर्षण के साथ खींचती हैं, जैसे कोई जादू हो उनके होने में...आवारा मसीहा उन्ही में से एक थी.

कहानी, उपन्यास, नाटक, एकांकी, संस्मरण, बाल साहित्य सभी विधाओं में प्रचुर साहित्य लिखने के बावजूद 'आवारा मसीहा' उनकी पहचान का पर्याय बनी। 'अर्द्धनारीश्वर' पर उन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला। उन्होंने अपना पहला नाटक 'हत्या के बाद' लिखा और हिसार में एक नाटक मंडली के साथ सक्रिय हो गए। इसके बाद तो उन्होंने लेखन को ही अपनी जीविका का आधार बना लिया। देश आज़ाद होने के बाद वह दिल्ली आ गए और सितम्बर 1955 से 1957 तक आकाशवाणी में नाट्यनिर्देशक रहे। उन्हीं दिनो उन्होंने राष्ट्रपति भवन में दुर्व्यवहार के विरोधस्वरूप 'पद्मभूषण' की उपाधि लौटाने की घोषणा कर दी।

'आवारा मसीहा' के लिए उनको 'पाब्लो नेरूदा सम्मान', 'सोवियत लैंड नेहरू पुरस्कार' जैसे कई विदेशी पुरस्कार मिले। प्रसिद्ध नाटक 'सत्ता के आर-पार' पर उन्हें भारतीय ज्ञानपीठ से 'मूर्ति देवी' सम्मान मिला। वह हिंदी अकादमी, दिल्ली के 'शलाका सम्मान' से भी समादृत हुए। बाद में 'पद्म भूषण' पुरस्कार भी मिला, लेकिन उसे उन्होंने क्षुब्ध होकर लौटा दिया। यह उपन्यास जब ‘साप्ताहिक हिन्दुस्तान’ में धारवाहिक रूप से आ रहा था, लोगों की इसके प्रति ललक तब भी देखी जा सकती थी। छपने के साथ ही यह ज्ञानपीठ पुरस्कार के लिए नामित हो गया। यह अलग बात है कि उस साल वह पुरस्कार ‘तमस’ के लिए भीष्म साहनी को दिया गया। विष्णु प्रभाकर को साहित्य अकादमी सम्मान उसके 20 साल बाद ‘अर्द्धनारीश्वर’ के लिए मिला। यह अलग बात है कि न ‘अर्धनारीश्वर’ आवारा मसीहा से अच्छी किताब थी और न ‘तमस’ ही उससे श्रेष्ठ। वह एक भूल रही, जिसकी भरपाई अकादमी ने दो दशक बाद की लेकिन विष्णु जी ने उससे कभी अपना मन मलिन नहीं किया।

एक बार विष्णु प्रभाकर से जब पूछा गया कि ‘एक लेखक होकर आप अपनी स्वतंत्र कृति रचने के बजाय अपने जीवन के अनमोल 14 बरस किसी ऐसी कृति में क्यों खर्च करते रहे जो ठीक तरह से आपकी भी नहीं होनेवाली थी. इसके बावजूद आपको इसे (आवारा मसीहा) लिखने की आवश्यकता क्यों जान पड़ी.’ इसपर विष्णु प्रभाकर ने एक निश्छल हंसी हंसते हुए जो जवाब दिया कि ‘तीन लेखक हुए, जिन्हें जनता दिलो जान से प्यार करती है। तुलसीदास, प्रेमचंद और शरतचंद्र। अमृत लाल नागर ने ‘मानस का हंस’ लिखकर तुलसी की छवि को निखार दिया। अमृत राय ने कलम का सिपाही लिखा, तो हम प्रेमचंद को नजदीक से देख सके लेकिन शरत के साथ तो कोई न्याय हुआ। उनके ऊपर लिखनेवाला कोई हुआ, न कुल-परिवार में और कोई साहित्यप्रेमी ही। यह बात मुझे 24 घंटे बेचैन किए रहती थी इसीलिए मुझे लगा कि मुझे ही यह काम करना होगा।’

लोगों को यह भी अजीब लगता था कि एक गैर-बंगाली व्यक्ति शरतचंद्र की जीवनी लिखने के लिए इतना परेशान क्यों है, जबकि स्वयं उनकी बांग्ला-भाषा में उनकी कोई संपूर्ण और प्रामाणिक जीवनी नहीं लिखी जा सकी थी। शरतचंद्र के स्त्री पात्र इतने सशक्त हैं कि महिला पाठकों के मन पर उसकी अमिट छाप रही है। यह भी हैरत की बात हो सकती है कि साहित्य लेखन से ही अपनी घर-गृहस्थी चलाने वाले विष्णु जी ने उस जीवनी को तैयार करने पर अपनी जिंदगी के चौदह साल खर्च कर दिए। यदि हम आवारा मसीहा की रचना प्रक्रिया और खुद विष्णु प्रभाकर के व्यक्तित्व पर नजर डालें तो यह गुत्थी कुछ हद तक सुलझ जाती है। शरतचंद्र को अपने लिए भ्रांतियों और अफवाहों से घिरे रहने का शौक था। इसलिए उनके बारे में नई-नई कहानियां निकलती रहती थीं। ‘सब मिथ्या, एकदम सत्य नहीं.’ वह कोई फिक्रमंद ही होता होगा जो इन कहानियों की तस्दीक उनसे करने जाए. अमूमन तो लोग सुनते और उसमें दो चार बातें और मिलाकर परोसते-उड़ाते. यूं भी उनके नशा करने और एक अनजान स्त्री के साथ यूं ही रहने को समाज में बुरी नजर से न देखने वाले लोग दुर्लभ ही थे. इस अनजान महिला के बारे में भी तरह-तरह के अनुमान आसपास के लोगों में थे. इनपर कभी उतनी स्पष्टता न आ पाती यदि विष्णु प्रभाकर इस घटनाक्रम को ‘आवारा मसीहा’ शामिल न करते. इस किताब के मुताबिक उस ‘अनजान’ स्त्री को शरतचन्द्र ने अपनी वसीयत में पत्नी कहा था और अपनी चल-अचल संपत्ति पर उनका ही हक माना था.खुद से जुड़े लोकोपवादों को फैलाने में शरतचंद्र स्वयं खूब दिलचस्पी लेते थे। उनकी आदत थी कि अपने बारे में कहीं भी कुछ भी बोल देते थे। कई बार वे बातें सच होतीं तो कई बार निरी गप्प। आवारा मसीहा के लिए सामग्री इकट्ठा करने के क्रम में विष्णु प्रभाकर सिर्फ शरत के जीवन प्रसंगों या फिर उनसे जुड़े लोगों की तलाश ही नहीं करते रहे बल्कि वे शरतचंद्र के किरदारों की तलाश में भी इधर-उधर खूब भटके। इसी चक्कर में बिहार, बंगाल, बांग्लादेश, बर्मा और देश-विदेश के हर उस कोने में गए, जहां से शरत का वास्ता रहा था।

‘आवारा मसीहा’ की अभूतपूर्व ख्याति की वजह विष्णु प्रभाकर का शरत से वह अद्भुत लगाव तो रहा ही लेकिन इस काम में उनकी गांधीवादी निष्काम भावना की भी अहम भूमिका रही. ‘आवारा मसीहा’ जैसी किताबों बिना इस भाव के नहीं लिखी जा सकतीं.

कभी भुलाए नहीं भूलेगा हिंदी का वह 'आवारा मसीहा'


-Govind Pratap Singh

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