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जानिए...! कोरोना से कैसे लड़ रहा है केरल?

अरुण कुमार

"शिक्षित व्यक्ति ही एक उत्कर्ष समाज को बना सकता है"

इस बात का प्रत्यक्ष प्रमाण पूरे देश के सामने है केरल। जी हां केरल, जहां का साक्षरता अनुपात 93.91% है, पूरे भारत में सबसे अधिक, फिर मेरे मन में ये सवाल आया कि सिर्फ़ शिक्षित होने से ही सब कुछ हो जाता है, तो विश्व के कई देश इससे भी ज़्यादा शिक्षित हैं, लेकिन वो देश भी इस कोरोना महामारी के आगे बेबस दिखाई दे रहे हैं, विश्व के सभी क़द्दावर नेता इतना लाव-लश्कर होने के बावजूद ख़ुद को असहाय महसूस कर रहे हैं, और अपने हथियार डाल चुके हैं।


केरल के मुख्यमंत्री पिनराई विजयन

लेकिन इस महामारी के आगे हार नहीं मानने कि ज़िद पर अड़ा है केरल, जिसके पीछे खड़े है कुछ ऐसे ही असीम मनोबल और दृढ़ निश्चयी व्यक्तित्व जो इस तूफान में भी अपना लंगर डाले हुए है, और वो है, श्री पिनराई विजयन (मुख्यमंत्री, केरल) श्रीमती के के शैलजा (स्वास्थ्य मंत्री, केरल), श्री पी बी नूह (डीएम- पठानमथिट्टा ज़िला), श्री गिरीश (नारियाल वाला) (जिनको आप तस्वीरों में देख रहे हैं) और भी कई नाम है, कोरोना से लड़ने के लिए इनके हथियार है दूरदर्शिता, पूर्वानुमान, तत्परता, पारदर्शिता,सहभागिता और समर्पण। केरल में मंगलवार को 3 नए मामले सामने आए हैं। अब यहां covid-19 के 502 मामले हो गए हैं, जिसमें 462 लोग ठीक हो चुके हैं, जबकि 37 active केस हैं जिनका इलाज़ चल रहा है और सिर्फ 3 लोगों की मौत हुई है, जिसमें एक 10 महीने का बच्चा भी था। बल्कि केरल के बाहर वहां के 70 बाशिन्दों की मौत COVID-19 से हुई, जो लोग विश्व के अलग अलग देशों में थे। ये आंकड़े आपको हैरान कर देंगे और सवाल ज़रूर उठेगा कि विश्व के सारे देश जिस महामारी के आगे नाकाम है, उससे केरल की ये लड़ाई अदभुत है। तो आइए इस लड़ाई के हथियार और व्यक्ति विशेष के बारे में बात करें- 1. दूरदर्शिता - पिछले 15 सालों में केरल ने अपने Primary Healthcare System को बेहतर और बेहतर बनाने के लिए लगातार प्रयास किया है। जिसमें आर्द्रम मिशन ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। Aardram Mission के अंतर्गत स्वास्थ्य केंद्रों का एक जाल बना हुआ है जो उन लोगों तक सीधे और सबसे कारगर तरीके से पहुंचता है जिनको उसकी सबसे ज़्यादा ज़रूरत है। आर्द्रम मिशन, केरल सरकार की इस लड़ाई में सबसे बड़ा और महत्वपूर्ण हथियार है। इसी कड़ी में, 1996 में केरल ने पीपुल्स प्लान कैंपेन (PPC) यानी decentralisation of governance का फॉर्मूला अपनाया, जिसके तहत 35% बजट केंद्रीकृत नौकरशाही के बजाए स्थानीय समूह के हाथ में आ गया, और उन्होंने ये फैसला किया कि इस बजट से प्राथमिक ही नहीं बल्कि माध्यमिक हेल्थकेयर को भी मज़बूत किया जाए, और आज इस लड़ाई में ये फैसले वरदान साबित हुए। 2. पूर्वानुमान- कुदुम्मबाश्री 1998 में इसकी शुरुआत पूर्व प्रधानमंत्री स्वर्गीय श्री अटल बिहारी वाजपेयी के कर कमलों से हुई। कुदुम्मबाश्री ने अपनी शुरुआत से ही राज्य की हर गरीब महिला को जोड़ने का प्रयास किया है, जिसके परिणामस्वरूप आज कुदुम्मबाश्री हर ग्राम पंचायत और नगरपालिका के वार्ड, कॉलोनी में मौजूद है और महिलाएं ही इसकी संचालक होती है। इस महामारी में कुदुम्मबाश्री पूरे केरल में 989 सामुदायिक रसोई दिन रात चला रहा है जहां भोजन तैयार किया जाता है। होम क्वारंटीन और ज़रूरतमंद लोगों को घर पर वितरित किए जाते हैं। केरल की सबसे बड़ी समस्या को वहां की महिलाओं ने न सिर्फ हल किया बल्कि एक मिसाल भी कायम की है। 3. तत्परता- निपाह वायरस से 2018 में सिर्फ केरल ही जूझ रहा था लेकिन कहते हैं न कि हर विपदा आपको कुछ सीख देकर जाती है। केरल ने निपाह महामारी से लड़ते हुए बहुत महत्वपुर्ण सबक सीखे और किसी भी महामारी को सफलतापूर्वक ख़त्म करने का विश्वास प्राप्त किया। निपाह का डेथ रेट 25% से 60% था। इस अनुभव के बाद, सरकार ने भविष्य में इसी तरह के संकट की स्थिति में बेहतर तैयारी सुनिश्चित करने के लिए विभिन्न उपाय किए। एक उपाय जो सबसे अहम है कि लक्षणों के दिखने से पहले 14 दिनों के लिए प्रत्येक पॉज़िटिव व्यक्ति के संपर्क में आने वाले हर शख़्स की पहचान की जाती है, उन्हें क्वारंटीन किया जाता है। संपूर्ण ऊष्मायन अवधि के लिए स्वास्थ्य कार्यकर्ता और आशा कार्यकर्ता उनके साथ, हर सुबह-शाम फोन पर संपर्क करते हैं। यदि रोगी किसी भी लक्षण की रिपोर्ट करता है, तो उन्हें COVID-19 पॉज़िटिव माना जाता है, और नामित एंबुलेंस में निर्दिष्ट उपचार केंद्रों में से एक आइसोलेशन वार्ड में ले जाया जाता है। वहां परीक्षण किया जाता है। वे तब तक quarantine में रहते हैं जब तक उनका परिणाम निगेटिव नहीं आ जाता। यदि कोई व्यक्ति सकारात्मक परीक्षण करता है, तो चक्र फिर से शुरू होता है: उनके सभी संपर्कों की पहचान की जाती है और उनके साथ पालन किया जाता है। यह संसाधन-गहन प्रक्रिया जनवरी में शुरू हुई और इसे तब तक बनाए रखा जाएगा जब तक कि महामारी का ख़तरा ख़त्म नहीं हो जाता। केरल प्रशिक्षण के मामले में देश में सबसे आगे है जो इस लड़ाई की सफलता का आधार है, केरल हर 10 लाख लोगों में 604 प्रशिक्षण कर रहा है जबकि देश का औसत 105 प्रशिक्षण प्रति 10 लाख लोग है, अब तक केरल कुल 25 हज़ार टेस्ट कर चुका है, दूसरी तरफ केरल 28 दिनों तक संक्रमित और उनके संपर्क में आये लोगो को quarantine कर रहा है। जो कि भारत सरकार के निर्देशों से भी अधिक है। इस महामारी से निपटने के लिए एक आयरन लेडी, सख़्त टीचर केरल में मौजूद है जिसका नाम है श्रीमती के के शैलजा जो केरल में शैलजा टीचर के नाम से फेमस है। जिसके आगे निपाह जैसी बीमारी घुटने टेक चुकी है। जो इस महामारी से भी दिन रात एक करके लड़ रही हैं और पिछले दो महीने से अपने घर नहीं गई हैं। ये भगीरथ कार्य उन्हीं के कुशल नेतृत्व में हो रहा है।

4. पारदर्शिता- इसका जिम्मा मुख्यमंत्री पिनराई विजयन ने खुद लिया है, वह टेलेविज़न पर दैनिक अपडेट प्रदान करते हैं, जिसमें वे नागरिकों को नए मामलों की संख्या, ठीक हुए लोगों की संख्या और मृत लोगों की सूचना देते हैं; वह सरकार की कार्रवाइयों की रूपरेखा को जनता के सामने रखते है और एहतियाती उपायों, जैसे कि शारीरिक दूरी के महत्व बताते है। वह लोगों को स्वास्थ्य सेवा तक पहुंचने में आने वाली दिक़्क़तों पर भी बात करते हैं और लोगों को क्या सावधानी रखनी चाहिए ये भी बताते है। संचार का यह तरीका लोगों के बीच भय कम करने में, सरकार की स्थिति को स्पष्ट करने में और सरकार पर विश्वास बढ़ाने में मदद करता है।

5. सहभागिता- एक तरफ केरल के 33,115 आगनवाड़ी केंद्र 4.75 लाख ग़रीब बच्चों की शिक्षा, खान-पान और सुरक्षा का ध्यान रख रहे हैं वहीं दूसरी तरह अल्लापुज़ह ज़िले के सभी हाउसबोट को होम क्वारंटाइन सेंटर की तरह प्रयोग में लाये जा रहे है और इसी ज़िले में लोगों को घर से बाहर निकलने पर मास्क के साथ छतरी लेकर चलना अनिवार्य है जिससे लोगों में एक निश्चित दूरी बनी रहे। हर स्तर पर ऐसी ही सहभागिता के कई नायब तरीके खुद केरल वासियों ने खोज निकाले हैं जो काबिले तारीफ है।। इस समय देश मे जो सबसे आम नज़ारा है वो माइग्रेंट लेबर (migrant labours) के नाम से पहचाने जाने वाले लोगों का परिवार समेत पैदल अपनी गांव की तरफ निकल पड़ना। लेकिन जो बात मेरे दिल को सबसे ज़्यादा अच्छी लगी वो है एक शब्द "अतिथि कामगार" (Guest workers)। केरल ने अपने 3.38 लाख अतिथि कामगारों के लिए 18,912 शेल्टर होम्स और 4603 रिलीफ कैंपों की व्यवस्था की है। जिसमें खाना कुदुम्मबाश्री के सामुदायिक रसोई से पहुंचाया जाता है।

6. समर्पण- केरल का एक ज़िला है, पथनमथिट्टा, ये वही ज़िला है जहाँ की साक्षरता दर है 96.93% है और इस ज़िले के कलेक्टर है श्री पी. बी. नूह, जिनको a man with a gift of instant decision making भी कहा जाता है। उनकी इस विलक्षण प्रतिभा को हम केरल में आई बाढ़ के दौरान 14,000 लोगों को रेस्क्यू कर बचाते हुए देखा है, फिर सबरीमाला मंदिर के विवाद से लोहा लेते देखा है और अब इस महामारी से अपने ज़िले को बचाने में भी ये नौजवान ज़िलाधिकारी पहली पंक्ति में लगातार खड़ा दिखाई दे रहा है। श्री पी बी नूह साहब की कंधे पर राशन की बोरी लदी हुई फ़ोटो तो आपने देखी ही होगी जो पैदल, पैंट मोड़ के नदी पार कर ज़रूरतमंदों को राशन पहुंचाते हैं।


पी.बी. नूह, पथनमथिट्टा; कलेक्टर

इसी कड़ी में एक नाम है गिरिश जो केरल के कलावूर ज़िले में नारियल के पेड़ से नारियल तोड़ता है लेकिन अपनी इस छोटी कमाई में से वो एक बड़ा हिस्सा नालावूर के सड़को पर खड़े पुलिस वालों को पानी की बोतल, केला और खाने का पैकेट अपने बाइक पर प्रतिदिन पहुंचता है। ये इस राज्य के लोगों का समर्पण, त्याग और बलिदान ही है जिसके प्रताप से कोरोना जैसी कई बीमारियां खत्म हो जाएंगी।। सभी हथियारों को योजनाबद्ध तरीके से, केरल कितनी परिपक्वता से इस्तेमाल कर रहा है और वहाँ एक सकारात्मक फ़िज़ा है जो covid-19 को हरा के ही मानेगी। ये उन्होंने पहले भी किया है और इस बार भी करके ही रहेंगे। यह लेखक के निजी विचार हैं।

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