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हैदराबाद एनकाउंटर: लोकतंत्र के तीसरे खंभे में जनता के अविश्वास की दरार !

नई दिल्ली: अंग्रेजी में एक कहावत है ‘न्याय में देरी न्याय से वंचित होने के समान है.’ कल पूरे देश ने हैदराबाद में हुए अपराधियों के एनकाउंटर का जश्न मनाया. यह जश्न शायद लोगों के न्याय व्यवस्था से उठते भरोसे को भी दिखाता है. जो न्याय के आस में दशकों तक इंतजार करते हैं. इंतजार करते हैं कि जल्द अपराधियों को सज़ा और पीड़ित को न्याय मिले. न्याय का इंतजार करते हुए शनिवार को उन्नाव की पीड़िता ने भी दुनिया को अलविदा कह दिया.


अब हैदराबाद में घटी घटना के वक्त पीड़ित परिवार की रिपोर्ट लिखने में आना-कानी करने वाली पुलिस नायक बन चुकी है. सवाल यह उठता है कि लोगों का देश की न्याय व्यवस्था पर से भरोसा क्यों उठता जा रहा है ? देश में लोगों को न्याय मिलने में इतनी देरी क्यों हो रही है ?


दरअसल इन सवालों का जवाब आंकड़ों में छिपा है. आपको बता दें कि साल 2018 में डाली गई RTI से कुछ आंकड़े निकल कर सामने आए हैं. देश के 24 उच्च-न्यायालयों में से 14 न्यायालयों के ऑकड़ों से पता चलता है कि देश में एक जज के पर 11,015 से लेकर 348 केसेज़ का बोझ है. वहीं अगर हाईकोर्ट में जजों के खाली पदों की बात करें तो, स्वीकृत जजों की पदों की संख्य़ा 568 है. जिनमें से 219 पद अभी तक खाली हैं. जाहिर है, इन खाली पदों की वजह से देश की न्याय प्रक्रिया प्रभावित हो रही है.



हाईकोर्ट के अधीन राज्यों की जनसंख्या का अनुपात देखा जाए तो 2 लाख से लेकर 4 लाख लोगों पर एक जज हैं. अलग-अलग राज्यों में हाईकोर्ट में पड़े पेंडिग मामलों की बात करें तो, इसमें हैदराबाद हाईकोर्ट का नाम सबसे उपर आता है. हैदराबाद हाईकोर्ट में 3 लाख 22 हज़ार मामले पेंडिग हैं. वहीं इसके बाद कर्नाटक हाईकोर्ट का नंबर आता है. जहां 3 लाख 19 हज़ार मामले पेंडिग पड़े हैं. इसके बाद बॉम्बे हाईकोर्ट में 2 लाख 73 हज़ार और कोलकाता हाईकोर्ट में 2 लाख 22 हज़ार मामले पेंडिग पड़े हैं.


निचली आदालतों की बात करें तो लगभग तीन करोड़ मामले पेंडिग पड़े हैं. साल 2011 की जनगणना के अधार पर देश में प्रति 10 लाख जनसंख्या पर केवल 18 जज हैं. जबकि इतनी जनसंख्या पर जजों की संख्या तक़रीबन 50 होनी चाहिए. वहीं जजों की संख्या की बात करें तो कर्नाटक हाईकोर्ट में कुल जजों की संख्या 62 है, पर वहां अभी आधे से भी कम जज यानी 29 जज काम हैं. वहीं बॉम्बे हाईकोर्ट में 25 जजों की और कोलकाता हाईकोर्ट में 35 जजों की कमी है.


इन आंकड़ों के माध्यम से हम कह सकते हैं कि भारत में हाईकोर्टों की दशा असल में क्या है. इसके बिनाह पर यह अंदाज लगाया जा सकता है कि लोकतंत्र के तीसरे खंभे की क्या हालात है. जहां एक न्यायधीश पर औसत 11 हज़ार से ज़्यादा मुकदमों का बोझ है, वहां हम समय पर न्याय की उम्मीद कैसे कर सकते हैं.

इसी बोझ के नीचे हमारी न्याय व्यवस्था भी कहीं न कहीं दबी हुई नज़र आ रही है. जिस न्याय के मंदिर से हम न्याय की उम्मीद करते हैं, उसके लिए न्याय कौन करेगा ? कहा जाता है कि न्याय में देर होने से जनता में असंतोष बढ़ता है. जनता में न्याय में हो रही देरी की वजह से असंतोष व्याप्त है. जिसके मद्देनज़र सरकार को इस जटिल समस्या को गंभीरता से हल करने की जरूरत है.


- रजत कुमार की रिपोर्ट