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राष्ट्र के विकास में सबसे बड़ी बाधा शिक्षा का बाजारीकरण

अर्पित तिवारी


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प्राचीन काल में शिक्षा ,चिकित्सा ,और भोजन नि:शुल्क उपलब्ध होते थे ,आज आधुनिक काल में इन तीनों चीजों को पैसा देने पर भी उचित नहीं मिल पाता भोजन और चिकित्सा तो हमें कुछ स्तर तक मिल जाती है लेकिन शिक्षा मिलना नामुमकिन सा हो गया है आज जब हम बात करते हैं कि हमारी सरकारें शिक्षा पर विशेष ध्यान दे रही है तो मैं नहीं समझ पाता कि क्या वह विशेष ध्यान यही है कि शिक्षा का मतलब आज सिर्फ एक व्यवसाय हो गया है आज कोई व्यक्ति अगर विद्यालय खोल रहा है या फिर खोलने का सपना देख रहा है तो उसका उद्देश्य सिर्फ अच्छा पैसा कमाना है ना की अच्छी शिक्षा देना आज के शिक्षक तो ऐसे हो गए हैं जो अपने बच्चों को शिक्षा देने के समय पर अपना वेतन बढ़ाने के लिए धरने पर बैठते हैं वे यह कतई नहीं सोचते कि जिस समय वह धरना दे रहे थे उस समय कई विद्यार्थियों का पढ़ाई में नुकसान हो गया आज के विद्यालय में जब हम जाते हैं अपने बच्चों का दाखिला कराने तो वहां के प्राध्यापक हमें बताते हैं कि आपको अच्छी पुस्तक, अच्छी ड्रेस ,अच्छी बैग ,यहां से तो उपलब्ध हो जाएंगे लेकिन जब हम उनसे पूछते हैं हमें अच्छी शिक्षा कहां मिलेगी तो वह कहते हैं कि उसके लिए आपको बाहर ट्यूशन लेनी पड़ेगी यह हाल है हमारे विद्यालयों का आज का शिक्षक तो एक व्यवसाई हो गया है जो कि विद्यालय से ज्यादा अपने कोचिंग का प्रचार प्रसार करता है जिसमें कि अधिक से अधिक बच्चे आकर पढ़ें और विद्यालय में जब वह पढ़ाने आता है तो बच्चों को अपने कोचिंग में आने के लिए कहता है जो बच्चा नहीं आता उसे कक्षा में उसके साथ दुर्व्यवहार करते हैं जिससे उन छात्र-छात्राओं का मनोबल कम होता है एक बच्चा जिसके माता-पिता गरीब तबके के हैं फिर भी वह अपने बच्चों को निजी स्कूलों में अच्छी शिक्षा के लिए भेजते हैं इतनी मजबूरियों के बाद वह विद्यालय जाता है लेकिन उसके पास ट्यूशन पढ़ने का पैसा कहां से आएगा यह वह शिक्षक नहीं सोचता है उसको सिर्फ इतना है कि उसके कोचिंग में बच्चा आकर पढ़ें आज के शिक्षण संस्थान एक किराने की दुकान की तरह हो गई है जहां फीस के नाम पर प्रतिवर्ष विद्यालय में कई कार्यक्रम जैसे विदाई समारोह, एनुअल फंक्शन आदि कार्यक्रमों के नाम पर बच्चों के अभिभावकों की जेब से पैसा लिया जाता है इसी तरह प्रतिवर्ष ड्रेस बदलना, नई प्रकाशन की पुस्तक लगाना, आज विभिन्न प्रकार की चीजों के लिए अभिभावक की जेब पर डाका डाला जाता है ऐसे विद्यालयों में शिक्षक के नाम पर हाईस्कूल फेल लोग पढ़ाते हैं जिन्हें स्वर व्यंजन तक नहीं आता तो आप जरा सोचिए जब शिक्षक ऐसा है वहां का बच्चा कैसा होगा निजी स्कूल के बच्चों को अपना नाम तक लिखना आता नहीं है इस तरफ शिक्षा विभाग के अधिकारी भी उदासीन बने हुए हैं इतना ही नहीं तथाकथित लोगों को बुलाकर विद्यालय को प्रचारित भी किया जाता है कि फला विद्यालय में अच्छी शिक्षा प्राप्त होती है हमारे देश की शिक्षा प्रणाली यह नहीं होनी चाहिए हमारे देश में तो गुरु शिष्य की गुरुकुल परंपरा चलती थी तभी तो अर्जुन और एकलव्य जैसे शिष्य निकलते थे आज तो अर्जुन और एकलव्य जैसे शिष्य देखना नामुमकिन हो गया है जो अपने गुरु के प्रति स्नेह रखते थे एक बार कहने पर अपना अंगूठा काट कर दे देते थे इसमें हमारी कोई गलती नहीं है इसमें गलती है हमारे शिक्षक की गुरु द्रोणाचार्य जैसे शिक्षक पहले शिक्षा देते थे बाद में गुरु दक्षिणा मांगे थे लेकिन आज के शिक्षक पहले गुरु दक्षिणा ले लेते हैं शिक्षा का नाम तो लेते ही नहीं है ऐसे शिक्षकों के बारे में श्री तुलसीदास जी ने श्री रामचरितमानस में लिखा है कि

।हरहि शिष्य धन, शोक न हरही

।ते गुरु घोर ,नरक में परही।।

इस श्लोक का अर्थ तो आप सब समझते ही होंगे आज जब भारत देश उभरता भारत नई आशाएं लेकर आ रहा है तो शिक्षा व्यवसाय क्यों बन गया है आज हम सब सपना देखते हैं कि आने वाले कुछ वर्षों में भारत देश फिर से सोने की चिड़िया बनने जा रहा है लेकिन हम यह नहीं समझ पाते कि भारत देश सोने की चिड़िया कैसे बनेगा जो भारत के भविष्य हैं हम उन्हीं के भविष्य के साथ खिलवाड़ कर रहे हैं भारत के विकास में शिक्षा अब ना तो ईमानदारी से ली गई सरकार की है ना ही समाज हित में किया जाने वाला स्वयंसेवी कर्म अब यह पूरी तरह से बाजारीकरण हो गया है यहां पर मैं बाजारीकरण शब्द का प्रयोग जानबूझकर कर रहा हूं यहां पर मैं निजीकरण भी उपयोग कर सकता था लेकिन बाजारीकरण शब्द का उपयोग इसलिए कर रहा हूं क्योंकि विद्यालय हमें अच्छी गुणवत्ता पूर्ण शिक्षा देने का वादा करते हैं जैसे कि एक दुकानदार करता है आज के हमारे शिक्षक ऐसा करके हमें और आपको धोखा नहीं देते बल्कि अपने भारत देश और भारत माता को धोखा दे रहे हैं यह बहुत गंभीर और सोचनीय विषय है कि इस बाजारीकरण से हमारा छात्र ही नहीं हमारा राष्ट्र भी कमजोर हो रहा है


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