• Vishwajeet Maurya

धरती माँ से लिया सब कुछ, पर धरती को दिया क्या?

जल, वायु, पृथ्वी, अग्नि और आकाश मानव जीवन के मूलभूत तत्व हैं। इन पंचतत्वों से ही मानव जीवन का निर्माण माना जाता है और इन्हीं से हमारी सृष्टि और मानव का अस्तित्व है। जब तक सृष्टि के इन पंचभूत तत्वों का समन्वय, संतुलन और संगठन निर्धारण परिमाण में संयोजित रहता है तो हम कहते हैं हमारा पर्यावरण सही है। जैसे ही इन घटकों का संतुलन बिगड़ता है तो पर्यावरण भी बिगड़ता है और हम कहते हैं कि पर्यावरण दूषित हो रहा है। प्रकृति और मनुष्य का सम्बंध आदि काल से परस्पर निर्भर रहा है।


Image Credit: Internet

प्राचीन काल में नदियों के किनारे ही सभ्यताओं का विकास हुआ अर्थात नदियों के किनारे से ही जीवन शुरू हुआ यदि हम यह कहें तो बिल्कुल भी गलत नहीं होगा। लेकिन अब समय बदल रहा है हम विभिन्न प्रकार की सभ्यताओं के विकास के बाद अब लगभग 2000 वर्ष आगे आ चुके हैं, आज हमारे पास जीवन में ढेरों उपकरण मौजूद है लेकिन फिर भी हमारा जीवन  उन्हीं पंचतत्वों से ही बना है यह बात हमें नहीं भूलनी चाहिए । हम विकास की अंधी दौड़ में इतने मशरूफ़ होते जा रहे हैं कि हम अपने आस्तित्व को खोते जा रहे हैं । अब हम नदियों के किनारे जीवन नहीं खोजते बल्कि अपने स्वार्थ के कारण इसमें कचड़ा, कूड़ा, नाले का पानी, दूषित वस्तुएं इत्यादि फेकते हैं ऐसा करने पर क्या हमने कभी खुद से प्रश्न किया कि यदि हम निरंतर ऐसा करते रहे तो उसके अंत की सीमा क्या होगी? 

या फिर क्या हमने कभी ऐसा सोचा कि इसका परिणाम क्या होगा ?? यदि नहीं तो शायद हम में और बेजुबान जानवरों में कोई अंतर नहीं बचता है । वैसे भी यदि सरकारी डेटा की मानें तो सैकड़ों झरने, नदियां, नाले विलुप्त हो चुके है और उनकी जगह पर अब बड़ी बड़ी इमारतें, मल्टीप्लेक्स और सड़के नजर आती हैं जबकि यह सब तो हमारे जीवन के निर्माण की आवश्यकता में कभी भी शामिल ना थे । सड़क पर फर्राटे भरती, हवा से बातें करती तेज रफ्तार गाडियां जैसे आज हम मनुष्यों को चिढ़ाती हैं कि हमें जिस शुद्ध वायु की सबसे अधिक आवश्यकता है हम उसी की प्रतिस्पर्धा में गाडियां दौड़ा रहे हैं । आज हम पेड़ की छांव में बैठकर बातें करने से ज्यादा बंद कमरे में एसी में बैठकर बातों का लुफ्त लेते हैं लेकिन क्या हमने ऐसा करते वक्त कभी सोचा कि इसकी अंतिम सीमा क्या होगी ? या फिर ये सोचा कि इसके परिणाम क्या होंगे या हम ऐसा करके किन चीजों को दांव पर लगा रहे हैं ? यदि नहीं तो शायद हम इंसान होने के कर्तव्य का निर्वाह नहीं कर पा रहे हैं और हमें इंसान कहलाने का कोई हक नहीं ।


Image Credit: Internet

पृथ्वी को हमने अपनी मां का दर्जा दिया है परन्तु क्या कोई अपनी जननी के साथ ऐसा करता है क्या जैसा हम कर रहे हैं? अपने खेतों में पेस्टीसाइड डाल डाल कर हैं अपनी धरती को मैली कर रहे हैं। हमारे पास खेती करने के दूसरे भी विकल्प है पर हम अपने लालच और अपने स्वार्थ में शायद आज अपनी प्रथ्वी मां के साथ छल कर रहे हैं ।  हे मनुष्य क्या ऐसा करने के बाद कोई मां अपनी संतान से खुश रह सकती है ? क्या यह एक पुत्र धर्म है ?  बढ़ते तापमान की वजह से पर्वत पर ग्लेशियर पिघल रहे हैं नतीजतन वर्षा में कमी और तापमान में भारी  बढ़ौतरी देखी गई है और बीते वर्षों में हमने हजारों हजार सभाएं कि लाखो करोड़ों रुपए खत्म किए और फिर उसमे भी अपने स्वभाव के अनुकूल स्वार्थी ही रहे और अपनी दमनकारी नीतियों से अपने ही भविष्य का गला घोटते रहे।  हम इस बढ़ते तापमान में देख सकते हैं कि जलवायु परिवर्तन  का हमारे मनुष्य जीवन सहित वन्य जीवन में भी  कितना अधिक खतरा बना हुआ है समय पर वर्षा ना होना इसका सबसे सटीक उदाहरण है ।  जब हम छोटे थे अक्सर अपने घर के बड़ों के साथ बैठकर रात में तारे गिनने की कोशिश किया करते थे लेकिन आज उसी आकाश की ओर देखकर ऐसा लगता है जैसे हमने बचपन में जो आकाश देखा था वह अब बदल गया है यह पहले जैसा नहीं रहा । क्या आपने कभी ये बदलाव महसूस किया ?


Image Credit: Internet

हम निरंतर अपने वनों और वृक्षों को काटते जा रहे हैं बीते कुछ एक सालो में हमने बहुतेरे जंगलों में आग लगते देखी। बहुतेरे वन्य जीवों का बेघर होना देखा, तड़पना देखा, लेकिन क्या कभी ये विचार किया कि इसका जिम्मेदार कौन है ? आखिर हम मनुष्यों को इसके लिए क्या करना चाहिए ? अगर नहीं तो हम बताते हैं कि ये आग हमने लगाई है ये आपदा खुद चलकर नहीं आई बल्कि  हमने इसे न्योता दिया है अपने जीवन में आने का और इन सब के जिम्मेदार हम हैं ।

हमारी पृथ्वी जिसे हम मां कहते हैं उसकी हम इकलौती संतान नहीं है और भी हजारों जीव जंतु है इसमें लेकिन इसके विनाश की नींव अकेले हमने रखी है और इसके दमन कि शुरुआत भी हमने की है और यह बात हम गर्व से कह सकते हैं क्योंकि हम मनुष्य है क्या ऐसा कहते या करते वक्त हमें शर्मिंदगी महसूस नहीं होती ? हमें सांस लेने के लिए ऑक्सीजन की आवश्यकता होती है और यह ऑक्सीजन हमें पेड़ों से मिलती है और उसी ऑक्सीजन को हम निरंतर काट रहे हैं और इन सब के  बीच आपको एक खुशखबरी बता दें कि आपकी इन विनाशकारी नीतियों ने अब ऑक्सीजन स्टेशन भी बना दिए हैं जहां हम हज़ारों रुपए खत्म करके अब ऑक्सीजन ले सकेंगे जो अबतक हमें हमारे वातावरण से निशुल्क मिलती थी और मिलती रही आ है।


Image Credit: Internet

शायद हमने बहुत देर कर दी है लेकिन अभी भी उतनी देर नहीं हुई कि वापस ना आया जा सके, मां कभी भी अपने बच्चों को अकेला नहीं छोड़ती हमेशा उसके लिए एक विकल्प बचा के रखती है हमारे पास भी विकल्प है और वैश्विक महामारी कोरोना ने हमें ये मौका दे दिया है जहां हम इस बात पर पुनः  विचार कर सकें कि हमारे जीवन के निर्माण के लिए जिन पंचतत्वों की हमें आवश्यकता है उनका दमन ना करें उन्हें संजोग कर रखे ताकि हमारी आने वाली पीढ़ियां भी उनका उसी तरह से लुफ्त उठा सकें जैसे कि हम और  हमारे पूर्वज उठा रहे । आखिर हमारी भी संताने है और हम भी किसी की संताने है  ! और इस पृथ्वी मां की हम सभी संताने है ! अगर आप इंसान हैं तो विचार जरूर कीजिएगा !!!

कलमकार- विकास यादव


#pollution #effect #air #airpollution #plastic

#environment #climatechange #nature

#savetheplanet #plasticpollution

ये भी पढ़ें:हिमाचल प्रदेश की 91 तहसीलों में मारे जाएंगे बंदर, सरकार ने जारी की अधिसूचना ये भी पढ़ें: नहीं रहे छत्तीसगढ़ के सपनों के सौदागर "अजित जोगी"


ये भी पढ़ें: वायरल: देखिये कानपुर जीएसवीएम की प्राचार्य का धार्मिक नफरत फैलाने वाला वीडियो

ये भी पढ़ें: राजकोट नगर निगम ने कोरोना पॉजिटिव लोगों की जानकारी गूगल मैप्स पर लिस्ट करी

20 views

©Newziya 2019, New Delhi.