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कोटा में मौत का तांडव

दो दिन में 9 बच्चों की मौत के साथ कोटा के जे.के. लोन अस्पताल में दिसंबर महीने में मरने वाले बच्चों की संख्या बढ़कर 100 हो गई. दिसंबर में राजस्थान के कोटा के एक सरकारी अस्पताल में हुई मौतों ने देश की स्वास्थ्य व्यवस्था को शर्मसार कर दिया। बच्चों की मौत से जागी राजस्थान सरकार ने मंगलवार को मेडिकल कॉलेज से जुड़े अस्पतालों में सभी मेडिकल उपकरणों के फंक्शनल स्टेटस की जांच का आदेश दिया।


मौतों के बाद जागी सरकार

इस बीच कोटा की जे.के. लोन अस्पताल के नवनियुक्त उप अधीक्षक डॉ. गोपी किशन शर्मा ने बताया कि इस नए साल में “1 जनवरी से अब तक तीन बच्चों की मौत हुई है. अस्पताल में खराब उपकरणों को काफी हद तक ठीक करवा लिया है. कुछ नए भी मंगवा लिए हैं. 19 वेंटिलेटर में से 10 अभी चालू है. 6 बिल्कुल ही खराब हो चुके हैं. 38 वारमर से 36 वारमर सही है. 8 नए इन्फ्यूजन पंप मंगवा लिए हैं. न्यू ब्लेजर की कोई दिक्कत नहीं है. उनकी कोई कमी नहीं आ रही है.”

वहीं, मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने कहा कि कोटा में हुई बीमार शिशुओं की मृत्यु पर सरकार संवेदनशील है. इस पर राजनीति नहीं होनी चाहिए. कोटा के इस अस्पताल में शिशुओं की मृत्यु दर लगातार कम हो रही है. हम आगे इसे और भी कम करने के लिए प्रयास करेंगे. मां और बच्चे स्वस्थ रहें यह हमारी सर्वोच्च प्राथमिकता है.

अशोक गहलोत ने कहा, 'स्वास्थ्य सेवाओं में और सुधार के लिए भारत सरकार के विशेषज्ञ दल का भी स्वागत है. हम उनसे विचार विमर्श और सहयोग से प्रदेश में चिकित्सा सेवाओं में इम्प्रूवमेंट के लिये तैयार हैं. निरोग राजस्थान हमारी प्राथमिकता है. मीडिया किसी भी दबाव में आये बिना तथ्य प्रस्तुत करे, स्वागत है.'


अशोक गहलोत (मुख्यमंत्री राजस्थान)



पिछले कुछ दिनों की दर्दनाक कहानी

इससे पहले अस्पताल के सुपिरिंटेंडेंट डॉ. सुरेश दुलरिया ने बताया कि 30 दिसंबर को 4 बच्चों और 31 दिसंबर को 5 बच्चों की मौत हो गई। उन्होंने इसके पीछे वजह बताते हुए कहा कि जो मौतें हुई हैं, उनमें वे बच्चे शामिल हैं जो बहुत नाज़ुक स्थिति में हॉस्पिटल लाए गए थे. कुछ ऐसे थे जो जन्म के साथ ही कमज़ोर थे और किसी दूसरे हॉस्पिटल से सरकारी अस्पताल में लाए गए थे. सभी की मौत जन्म से कम वजन के चलते हुई है। दो दिन में 9 बच्चों की मौत के साथ कोटा के जे.के. लोन अस्पताल में दिसंबर महीने में मरने वाले बच्चों की संख्या बढ़कर 100 हो गई.

डॉ. दुलरिया ने बताया, '2018 में इस अस्पताल में 1005 बच्चों की मौत हुई थी जबकि 2019 में 963 बच्चों की मौत हो गई।' कोटा जिला कलेक्टर ओम कसेरा और अस्पताल सुपरिंटेंडेंट से मिले डेटा के अनुसार, 2014 से जे.के. लोन अस्पताल में शिशु मृत्यु दर हर साल कम हुई है। 2014 में 1,198 शिशुओं की मौत हुई थी, जो अस्पताल में भर्ती 15,719 बच्चों की संख्या का 8 फीसदी है।

दिसंबर 2019 में अधिक संख्या में शिशुओं की मौत के विवाद के बाद अस्पताल ने चिकित्सा उपकरणों को अपग्रेड और मेंटिनेंस पर ध्यान देना शुरू किया है। टाइम्स ऑफ इंडिया में 30 दिसंबर को छपी रिपोर्ट थी जिसमें लिखा था कि कोटा अस्पताल में 50 फीसदी से ज्यादा गैजेट्स काम नहीं कर रहे थे. इसे संज्ञान में लेते हुए मेडिकल एजुकेशन विभाग ने सभी मेडिकल कॉलेज के प्रिंसिपल और कंट्रोलर को पत्र लिखा था.

अस्पताल का दौरा करने वाली नेशनल कमीशन फॉर प्रोटेक्शन ऑफ चाइल्ड राइट्स (एनसीपीसीआर) की टीम ने बताया कि सर्दी के ऐसे मौसम में अस्पताल में खिड़की के शीशे टूटे हुए हैं, दरवाजे और गेट खराब हालत में हैं. बदइंतज़ामी का आलम ये है कि अस्पताल परिसर में खुलेआम सुअर घूम रहे हैं.

वहीँ एक अन्य जांच में पता चला है कि बहुत से महत्वपूर्ण चिकित्सा उपकरण जैसे, 19 वेंटिलेटर में से 13, 111 इन्फ्यूजन पंपों में से 81, 71 वार्मर के 44, 38 ऑक्सीमीटर के 32, और 28 नेबुलाइज़र के 22 तो काम करने की स्थिति में ही नहीं थे.

जांच में बाल रोग विभाग में चिकित्सा कर्मियों की कमी और बेड की अपर्याप्त संख्या का भी उल्लेख किया गया है. अस्पताल की स्थिति ऐसी है कि सरकार की जवाबदेही तो बनती ही है और अस्पताल में उपकरण और अन्य वस्तुओं की कमी को भी उजागर करती है.


रघु शर्मा (स्वास्थ्य मंत्री राजस्थान सरकार)


सरकार की तरफ से आंकड़े गिनाने का दौर रहा जारी

वास्तव में, राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने यह कहा कि “शिशुओं की मृत्यु अस्पतालों में हर दिन होती है और इस साल पहले के वर्षों में 1,300-1,500 मौतों के खिलाफ केवल 900 मौतें हुईं.”

वहीँ दूसरी तरफ राजस्थान के स्वास्थ्य मंत्री डॉ. रघु शर्मा का कहना है कि, राज्य में शिशु मृत्यु दर 2014 में 7.62%, 2015 में 7.17%, 2016 में 6.66%, 2017 में 6% और 2018 में 6.11% थी, लेकिन हमने इसे 2019 में 5.55% तक घटा दिया है। इतनी मौतों के बाद सरकार की उपलब्धियों के आंकड़े वाकई में फेल हो जाते हैं, ये बस कागज में दर्ज संख्याएँ भर होती हैं, जबकि असलियत ये हैं कि सरकार और सरकार का खोखला तंत्र बच्चों की जान नहीं बचा पाया .

मुफ़्त दवा स्कीम के कारण बढ़ा अस्पतालों पर बढ़ा दबाव

हॉस्पिटल के अधीक्षक डॉक्टर दुलरिया ने बीबीसी से बातचीत में कहा, "राज्य में मुफ़्त दवा स्कीम लागू किए जाने के बाद सरकारी अस्पतालों पर दबाव बढ़ा है. इस बढ़ते भार के अनुरूप हॉस्पिटल को तैयार किया जा रहा है."

हॉस्पिटल में संबधित विभाग के प्रमुख डॉ. अमृत लाल बैरवा ने मीडिया से कहा, "हॉस्पिटल में पर्याप्त डॉक्टर नहीं हैं. इन सबके बीच हॉस्पिटल स्टाफ़ इलाज के लिए पहुंचते मरीज़ों की ठीक से देखभाल कर रहे हैं."

डॉक्टर बैरवा ने मीडिया से कहा, "हमारे प्रयासों से ऐसी मौतों में कमी आई है. अस्पतालों पर मुफ़्त जाँच और दवा योजना के बाद काफ़ी दबाव बढ़ा है. क्योंकि प्राइवेट अस्पतालों में इलाज काफ़ी महंगा है."

डॉक्टर बैरवा ने रिकॉर्ड का हवाला देकर बताया, "वर्ष 2014 में 15 हजार 719 मरीज दाखिल हुए, उसमें से 1198 की मौत हुई. 2015 में 17569 दाखिल हुए. जबकि 1260 की मृत्यु हुई. वर्ष 2016 में 17892 भर्ती हुए और 1193 की मृत्यु हुई. वर्ष 2017 में मरीजों की संख्या 17216 और मृत्यु 1027, वर्ष 2018 में 16436 के मुक़ाबले 1005 की मौत हुई. इस वर्ष ये संख्या 940 है."



बच्चों की मौत मामले पर सोनिया ने नाराजगी जताई, मांगी रिपोर्ट

कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने बच्चों की मौत मामले पर नाराजगी जताते हुए प्रदेश प्रभारी राष्ट्रीय महासचिव अविनाश पांडे को तलब कर रिपोर्ट मांगी। सोनिया गांधी से मुलाकात से पहले अविनाश पांडे ने मुख्यमंत्री अशोक गहलोत और चिकित्सा मंत्री डॉ. रघु शर्मा से टेलीफोन पर बात की और फिर कांग्रेस अध्यक्ष को राज्य सरकार द्वारा किए जा रहे प्रयासों की जानकारी दी। पांडे ने बताया कि सोनिया गांधी ने इस मामले में गंभीरता दिखाई है, वे बच्चों की मौत को लेकर चिंतित है। इस मामले में राज्य सरकार पूरी तरह से संवेदनशील है।

किसी भी सरकारी अधिकारी ने दोषपूर्ण चिकित्सा उपकरणों के इतने सारे टुकड़ों को बदलने के लिए आपराधिक विफलता की बात नहीं की है। वही दूसरी ओर एक-दूसरे पर राजनीतिक दोष का खेल शुरू हो गया है. परन्तु राजनीतिक दोष मढ़ने के इस दौर से समस्या में कुछ बदलाव नहीं होगा. पिछले साल बिहार में भी 2019 के तीव्र एन्सेफलाइटिस सिंड्रोम का प्रकोप हुआ, जिसमें 150 से अधिक बच्चों की मौत हो गई और अगस्त 2017 में गोरखपुर के बीआरडी अस्पताल में 63 बच्चों की मौत हो गई.

‘भारत की आईआईटी कोचिंग फैक्ट्री के रूप में कोटा की प्रतिष्ठा और जे.के. लोन अस्पताल जैसी सरकारी सुविधाओं के क्षय की मौजूदगी भारत की विकास की कहानी में विपरीत परिस्थितियों का प्रतिनिधित्व करती हैं.’



- Govind Pratap Singh