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रुपया कमज़ोर करने पर क्यों तुली है भारत सरकार

Updated: Feb 14, 2019

भारत सरकार और भारतीय रिज़र्व बैंक (आरबीआई) के बीच चल रही खींचतान से तो हम सभी परिचित हैं, लेकिन इसकी वजह क्या है वो आपको न्यूज़िया बताएगा. आरबीआई भारत सरकार की सिक्योरिटीज़ और बॉन्ड की ख़रीद-फ़रोख़्त से जो ब्याज कमाती है. वही आरबीआई की कमाई है. आरबीआई इसी रक़म का प्रयोग करेंसी छापने और अन्य कामों में इस्तेमाल करती है. 1934 के आरबीआई एक्ट चैप्टर-4, सेक्टर-47 के अनुसार आरबीआई इस अतिरिक्त अधिशेष सरकार को ट्रांसफर करती है।


RBI

ग़ौरतलब है की सरकार ने केंद्रीय बैंक को तलब किया है कि वह अतिरिक्त राशि को जल्द से जल्द सरकार को ट्रांसफर करे ताकि सरकार उस रकम का उपयोग कर सके. इस मामले के चलते केंद्रीय बैंक ने सरकार को 10 हजार करोड़ अपने लाभ के अंश के रूप में ट्रांसफर भी कर दिए हैं.


इससे क्या होगा नुकसान ?


हम इस बात को एक आम आदमी की नज़र से समझते हैं, हमारे घरों में भी मोटी रकम खाते में नहीं होती हम उसको कहीं न कहीं निवेश कर के रखते हैं, जैसे एफडी, ज़मीन, सोना आदि. उसी तरह हमारे आरबीआई के पास भी इतनी रकम अभी नहीं होगी और यह रकम उसे इकट्ठा करने के लिए नए नोट छापने होंगे. जिसका सीधा असर भारतीय करेंसी रुपया पर पड़ेगा जो डॉलर के मुक़ाबले और कमज़ोर हो जाएगा.


न्यूज़िया आपको इसका विकल्प या ये कहें उपाय बताएगा -


भारत सरकार की ऐसी कई कंपनियां हैं जिनका राजस्व बहुत आता है. उदाहरण के तौर पर हम इंडियन ऑयल को लेते हैं. जो भारत सरकार के अंतर्गत आती है. यह भारत के किसी भी क्षेत्र की सबसे बड़ी कंपनी है और इस बात अंदाज़ा हम इसी से लगा सकते हैं की इंडियन ऑयल का राजस्व लगभग 4 लाख करोड़ रुपए है और नेट प्रॉफिट लगभग 21 हज़ार करोड़ रुपए है.


IOC

सरकार चाहे तो इंडियन ऑयल जैसी कंपनियों से लाभ का अंश ले सकती है. कोई ज़रूरी नहीं है की वह पूरी रकम आरबीआई या इंडियन ऑयल जैसी कंपनियों से ले. सरकार चाहे तो वह अलग-अलग कंपनियों से यह लाभांश ले सकती है लेकिन सरकार रुपए को कमज़ोर करने पर क्यों तुली है, जो पहले ही कमज़ोर है.

इस सवाल का जवाब सरकार को देना चाहिए की वह अन्य कंपनियों से लाभांश क्यों नहीं ले रही ?

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