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चाबहार: भारत-ईरान रिश्तों की बहार !

- सौरभ नारायण शुक्ला


पाकिस्तान से खराब संबंधों के चलते भारत के व्यापार को पश्चिमी एशिया और यूरोप में पहुंचाने का सुगम मार्ग है, चाबहार बंदरगाह. यह बंदरगाह गुजरात के कांडला बंदरगाह से सीधे जुड़ता है. यह एक समुद्री मार्ग है.

2003 में अटल बिहारी वाजपेई और गणतंत्र दिवस पर अतिथि ईरानी राष्ट्रपति खातमी ने महत्वाकांक्षी चाबहार परियोजना पर हस्ताक्षर किया था, लेकिन किन्हीं कारणों से यह कार्यक्रम सुस्त पड़ गया. इस परियोजना पर दोबारा चर्चा तब हुई जब प्रधानमंत्री मोदी ने मई 2016 में ईरान की यात्रा की. रूहानी-मोदी ने धड़ाधड़ 12 समझौतों पर हस्ताक्षर किए. जिससे भारत ईरान संबंधों में गर्माहट आ गई. इन समझौतों में प्रमुख था, चाबहार बंदरगाह.


भारत-पाकिस्तान रिश्तों में तल्खी के चलते हमें एक ऐसा व्यापारिक मार्ग चाहिए था. जिससे हमारा निर्यात-आयात पश्चिमी एशिया और यूरोप तक पहुंच सके. चाबहार को लेकर कूटनीतिज्ञ और अंतरराष्ट्रीय व्यापारी जोश से लबरेज़ थे. अब हमारा व्यापार ईरान से होते हुए अफगानिस्तान भी जा सकता था. इसके लिए भारत की इरकॉन (भारतीय रेल निर्माण लिमिटेड) ने ईरान की रेलवे शाखा के साथ समझौता किया. इसमें चाबहार बंदरगाह से जे़दान (ईरान) होते हुए जा़रान और काबुल (अफगानिस्तान) तक रेल मार्ग के निर्माण पर सहमति बनी. और अब हमें पाकिस्तान की जरूरत नहीं थी.

चाबहार बंदरगाह से जे़दान रेल रूट (तस्वीर साभार : इंटरनेट)

एक वर्ष तक चाबहार की गूंज जोर-शोर से सुनाई दी, लेकिन एक बार फिर यह परियोजना ठंडे बस्ते में चली गई. जब अमेरिका ने 2017 में ईरान पर प्रतिबंध लगाया. अमेरिका हमारा रहनुमा था, हम उसके फैसले का विरोध नहीं कर सके. लेकिन हमारी स्वामिभक्ति से खुश होकर उसने हमें तेल खरीदारी और चाबहार में रियायत दे दी. इसके बाद भी कहीं ना कहीं निवेशकों, भारत सरकार और उपक्रमों में हिचकिचाहट थी. परिणामस्वरुप चाबहार में उत्साह अब कम हो गया था.


इन प्रतिबंधों से ईरान-अमेरिका संबंधों में कड़वाहट आ गई और इसका सीधा प्रभाव भारत-ईरान रिश्तों पर पड़ा. हालांकि चाबहार की हमें नितांत आवश्यकता है, पर हमने इस मुद्दे पर लापरवाही बरती और सही मौका देख चीन ईरान से नजदीकियां बढ़ाने लगा. चीन को ईरान में भारत -विरोधी साझेदार नजर आने लगा. हाल में ही चीन ने ईरान से 25 वर्षीय रणनीतिक साझेदारी के तहत 400 बिलियन-डॉलर निवेश का समझौता किया है. वैसे तो भारत-ईरान की ऐतिहासिक दोस्ती है, पर कूटनीति में देशहित स्थाई है ना कि दोस्त. चीन और ईरान के बीच 'समग्र सहभागिता योजना' पर करार हुआ, और अब चीन चाबहार में भी निवेश कर सकेगा.


वैसे तो चाबहार भारत -ईरान का संयुक्त उपक्रम है, इसलिए भारत को निकालना मुश्किल है. ताजा घटनाक्रम के अनुसार भारत को चाबहार-जे़दान रेल मार्ग से अलग कर दिया गया है. हालांकि ईरानी अधिकारियों के अनुसार भारत अभी भी जे़दान रेल कॉरिडोर का हिस्सा है लेकिन स्थिति अभी साफ नहीं है.


इन सब परिस्थितियों को देखते हुए स्पष्ट है कि भारत को अमेरिका का संकोच किए बिना अपने राष्ट्रीय हित 'चाबहार' को साधना चाहिए. ईरान से सम्बन्ध बढा़ना चाहिए, और लुक वेस्ट (पश्चिम की ओर) नीति को अपनाना चाहिए. क्योंकि, अमेरिका से नाराजगी भारत को प्रतिबंध दे सकती है, पर उसकी चापलूसी भारत को चाबहार नहीं दे सकेगी.


(लेखक अंतर्राष्ट्रीय मामलों के जानकार हैं)

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