• Newziya

आरक्षण का कोलाहल

एक बार फिर आरक्षण का राग छेड़ दिया गया है।

राग एक सकारात्मक शब्द है। जब आरक्षण के लिए लोग उपद्रव पर उतर आएं। वाहन फूंक दें, लोगों की जान लेने पर उतारू हों तो इसे कोलाहल कहना ही उचित होगा।


राजस्थान में गुर्जर सड़कों पर उतर आए हैं। गुर्जरों ने धौलपुर, बूंदी के नैनवां और अजमेर में सड़क मार्ग जाम कर दिए हैं। 5 फीसदी आरक्षण के लिए ट्रेन की पटरियों पर भी तंबू गाड़ दिए हैं और जिस पटरी पर तंबू गाड़े हैं वो देश की व्यस्ततम लाइनों में से एक है। इसके चलते कई गाड़ियों के रूट बदले गए हैं और कई गाड़ियां रोक दी गयी हैं।


यह राग कोई नया राग नहीं है। आरक्षण को लेकर देश में कई बार आंदोलन हुए हैं। भारत में गुर्जर समुदाय की आबादी 5 करोड़ से ज्यादा है। गुर्जरों को 5 फीसदी आरक्षण मिले इसके लिए भी कई आंदोलन हुए हैं। लेकिन इसका परिणाम कुछ भी नहीं निकला। स्थिति वैसी ही बनी हुई है। पहली बार जब गुर्जरों के आरक्षण के लिए आंदोलन हुआ तब भाजपा सरकार थी। आरक्षण को हिंसक होता देख तत्कालीन सरकार ने आरक्षण की मांग मान भी ली थी। लेकिन मामला अदालत में जाकर रद्द हो गया है।क्योंकि कानूनी रूप से आरक्षण की सीमा 50 फीसदी से ज्यादा नहीं बढ़ाई जा सकती। ऐसे में गुर्जरों को 5 फीसदी आरक्षण देना असम्भव सा था।


Reservation : Reference


फिर उसके बाद राजस्थान में जब कांग्रेस की सरकार बनी तब भी 5 फीसदी आरक्षण की बात चली और सरकार ने मान ली। लेकिन अदालत ने फिर से उस पर रोक लगा दी।हालांकि उस समय गुर्जर समुदाय को 1 फीसदी आरक्षण मिल गया था। अब जब केंद्र सरकार ने सामान्य वर्ग के लोगों के लिए 10 फीसदी आरक्षण की घोषणा की है तो गुर्जरों ने बाकी 4 फीसदी आरक्षण उन्हें दिए जाने की मांग तेज़ कर दी है। इसके लिए वे आंदोलन में हिंसा भी कर रहे हैं। पुलिस जब उन्हें उठाने आयी तो उन्होंने पुलिस कर्मियों से हाथापाई भी की। पुलिस और गुर्जरों के बीच हिंसक झड़प भी हुई। यह समस्या आज की नहीं। ऐसा बाक़ी राज्यों में भी देखने को मिला है। पिछले कुछ सालों में आरक्षण की मांग बहुत बढ़ी है। महाराष्ट्र में मराठियों ने अपने लिए आरक्षण की मांग की तो गुजरात में पटेल समुदाय ने भी आरक्षण की मांग के लिए आंदोलन किए।जबकि ये सभी जातियां सामाजिक रूप से समर्थ मानी जाती हैं। ये जातियां शोषित और पिछड़ी नहीं मानी जाती हैं।

आरक्षण की मांग में हुए आंदोलन का निष्कर्ष कुछ नहीं निकला लेकिन देश को कई नेता ज़रूर मिल गए। जैसे गुजरात में पटेल समुदाय के नेता हार्दिक पटेल। आरक्षण देना राज्य सरकार का काम नहीं है। आरक्षण का मामला संविधान संशोधन का है। इसलिए वर्तमान गहलोत सरकार भी आरक्षण का मामला केंद्र के पाले में डाल रही है।


सभी राजनीतिक पार्टियों को पता है कि संविधान के अनुसार आरक्षण की सीमा को 50 फीसदी से नहीं बढ़ाया जा सकता है। संविधान में जिन जातियों को आरक्षण मिला हुआ है उनको कम करके दूसरे समुदाय के लोगों को भी आरक्षण नहीं दिया जा सकता। इसके बाद भी आरक्षण के लिए होने वाले आंदोलन में नेता वोट बैंक की रोटी सेंकना नहीं भूलते। राजनीतिक पार्टियों को जब भी जनाधार बढ़ाना होता है, चुनाव के समय आरक्षण का मुद्दा छेड़ देते हैं। इसके चलते आरक्षण का मुद्दा हमेशा प्रश्नांकित होता रहता है। आरक्षण की मांग करने वाले भी जानते हैं कि संविधान के तहत उनकी मांगों को पूरा करना किसी भी सरकार के लिए संभव नहीं है,फिर भी वे आंदोलन पर उतर आते हैं। इस दौरान रेल यातायात प्रभावित करना, उपद्रवी करना आम क्रिया कलाप होता है। इस अनर्गल मांग से देश की सम्पत्ति का जो नुक़सान होता है वह तो होता ही है साथ ही अन्य विकास कार्य प्रभावित होते हैं। ऐसे में अपनी क्षमता से बाहर वायदे करने वाले इन राजनेताओं और आरक्षण के लिए देश की सम्पत्ति की हानि करने वाले लोगों को सोचना चाहिए कि अपनी सहूलियत के लिए पूरे देश को प्रभावित करना कहां तक जायज़ है?


शशांक मिश्र

भारतीय जन संचार संसथान

©Newziya 2019, New Delhi.