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सरोजिनी नायडू : भारत की कोकिला

प्राची बाजपाई

Sarojini Naidu

एक नौ वर्ष की बच्ची बड़े जतन से कुछ पंक्तियाँ लिख रही थी। लिखने के बाद चहकते हुए अपनी माँ के पास जाकर उसने कहा -"माँ मैंने एक कविता लिखी है।" माँ ने कहा गा कर सुनाओ। उस बच्ची ने इतनी सुंदरता से उस कविता को पढ़कर सुनाया कि माँ भी हैरान रह गईं और मुँह से सिर्फ़ यही निकला "कोकिला"। आगे चलकर यही बच्ची भारत कोकिला कहलायी।

ये घटना है महान स्वतंत्रता सेनानी, कवियत्री, बहुभाषी भारत कोकिला सरोजनी नायडू के जीवन की। सरोजनी का जन्म 13 फ़रवरी 1879 को हैदराबाद में हुआ। इनके पिता अघोरनाथ चट्टोपाध्याय पेशे से वैज्ञानिक व शिक्षा शास्त्री थे और माँ वरदा बंगाला भाषा में कविताएँ लिखती थीं। बचपन से बालिका सरोजनी की शिक्षा दीक्षा की भरपूर सुविधाएँ थीं। पिता चाहते थे कि बेटी गणितज्ञ या वैज्ञानिक बने लेकिन सरोजनी का मन कविताओं में खूब रमता था।

बचपन से ही कुशाग्र-बुद्धि होने के कारण उन्होंने 12 वर्ष की अल्पायु में ही 12 वीं की परीक्षा अच्छे अंकों के साथ उत्तीर्ण की और 13 वर्ष की आयु में लेडी ऑफ दी लेक नामक कविता रची। उनकी एक कविता से प्रभावित होकर हैदराबाद के निजाम ने उन्हें विदेश में पढ़ने के लिए छात्रवृत्ति दी। जिसके बाद सरोजनी 16 वर्ष की उम्र में विदेश गईं। जहाँ उन्होंने पहले किंग्स कालेज और बाद में कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय के ग्रीतान कालेज से अपनी पढ़ाई पूरी की। 15 वर्ष की आयु में ही इनकी मुलाक़ात गोविंदजुलू नायडू से हुई। इनसे सरोजनी को प्रेम हो गया। पढ़ाई पूरी करने के बाद 19 वर्ष की आयु में सरोजनी ने इनसे विवाह कर लिया। श्री नायडू पेशे से डाॅक्टर और गैर ब्राह्मण थे उस दौर में अंर्तजातीय विवाह करना आसान नहीं था लेकिन इन्हें पिता का पूरा सहयोग मिला। इनका वैवाहिक जीवन सुखी था और इनकी चार संतानें भी हुईं।

1905 में बंगाल विभाजन के समर में सरोजनी स्वतंत्रता आंदोलन में कूद पड़ी। फिर इनकी मुलाकात महात्मा गाँधी ,एनी बेसेंट, रवीन्द्रनाथ टैगोर, जवाहर लाल नेहरू व अन्य क्रांतिकारियों से हुई। सरोजनी ने महिलाओं को सशक्त बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण कार्य किया। 1942 में हुए भारत छोड़ो आंदोलन में उन्होंने 21महीनों तक काल कोठरी की यातनाएं भी झेली।

देश की स्वतंत्रता के पश्चात इन्हें उत्तर प्रदेश का राज्यपाल पद सौंपा गया। सरोजनी स्वतंत्र भारत की प्रथम महिला राज्यपाल बनीं। 2 मार्च 1949 को हृदयगति रूक जाने के कारण देश की यह कोकिला सदा के लिए शांत हो गई। इनके कविता संग्रह आज भी पाठकों के बीच लोकप्रिय हैं।


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