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उन्मादी होता समाज....

Updated: Feb 20, 2019

कृष्ण मुरारी

वर्तमान में देश बेहद ही नाज़ुक और अशांत दौर से गुज़र रहा है। कुछ दिन पहले हुए जम्मू कश्मीर के पुलवामा में आतंकी हमले के बाद पूरे देश में पाकिस्तान के ख़िलाफ़ गुस्से का माहौल है। आतंकी संगठन जैश-ए-मोहम्मद ने इस आतंकवादी हमले की ज़िम्मेदारी ली है। पुलवामा में हुए आत्मघाती हमले में 44 सैनिक शहीद हुए हैं। जिसके बाद पूरे देश से कई प्रकार की प्रतिक्रियाएं आ रही है।


प्रतिक्रियाओं में देश कई धड़ों में बंटता नज़र आ रहा है। पहला, कुछ लोग कह रहे हैं कि युद्ध होना चाहिए।

दूसरा, बातचीत का समय अब नहीं है और भारत को पाकिस्तान को करारा जवाब देना चाहिए।

तीसरा, कुछ लोग यह भी कह रहे हैं कि बातचीत से ही हल निकल सकता है।


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ऐसे में सबसे बड़ी चुनौती समाज में उन्माद फैलाते लोगों से है, जो किसी विशेष प्रयोजन के तहत समाज में ग़लत जानकारियां औरआशांति फैला रहे हैं। इस समय सबसे बड़ी चुनौती आंतरिक अशांति है। ऐसे उन्मादी तत्व सबसे बड़ा ख़तरा बनकर उभर रहे है।


कुछ समय से ये उन्मादी तत्व हिंदू-मुसलमान के नाम पर समाज को दो-धड़ों में बांटने की कोशिश कर रहे हैं जिस कारण दोनों समुदाय के बीच टकराव बढ़ता जा रहा है।


भारत की लोकतांत्रिक यात्रा महज़ 70 साल पुरानी है। इन 70 सालों में लोकतांत्रिक परिपक्वता हासिल कर पाना आसान काम नहीं है। औपनिवेशिक शासन व्यवस्था से आज़ाद होकर एक नए प्रकार की व्यवस्था अपनाना और उसे सुचारू रूप से चला पाना भारत के लिए काफ़ी मुश्किल भरी यात्रा रही, लेकिन संविधान निर्माताओं और तब के राजनेताओं, दार्शनिक एवं समाजशास्त्रियों के योगदान से हम उन मुश्किलों का सामना करने में सफल रहे।


भारत का बंटवारा धार्मिक आधार पर हुआ। मुस्लिम समुदाय के लोगों ने एक नए देश की मांग उठाई जिसके कारण पाकिस्तान अस्तित्व में आया। इस दौरान कई सांप्रदायिक दंगे हुए जिसमें हज़ारों लोगों की निर्मम हत्या की गई।

आज़ादी के बाद से अब तक के सफ़र में भारत कई साम्प्रदायिक हिंसा से जूझा है।उदाहरण के तौर पर 1984 में इंदिरा गांधी की मृत्यु के बाद हुआ दंगा हो, 1989 में हुआ भागलपुर दंगा हो, 2013 में हुआ मुज़फ्फरनगर दंगा हो। इन सब में बेकाबू होती भीड़ ही अराजकता की मुख्य वज़ह थी।


अब सवाल उठता है कि लोग उन्मादी क्यों होते जा रहे हैं। इसके कई कारण है-


पहला, राजनीतिक कारण - भारत जैसे विशाल देश में हर किसी की चाहत है कि वह चुनकर इस देश पर राज करें।

ऐसे में मूल रूप से भारत में हिंदू समुदाय बहुसंख्यक है।

जो चुनावों की दशा-दिशा तय करने में मुख्य भूमिका निभाते हैं। इसलिए सभी राजनीतिक पार्टियां चाहती है कि हिंदू वोट बैंक का ध्रुवीकरण करके सत्ता हासिल करें। इसलिए वे युवाओं के ज़रिए अपनी राजनीति चमकाना चाहते हैं जिसका खामियाज़ा समाज को झेलना पड़ता है।

दूसरा, सामाजिक कारण - बेरोजगारी,गरीबी और जनसंख्या वृद्धि जैसी समस्याएं भी लोगों को उन्माद के रास्ते पर पर ले जाती है।

तीसरा, आतंक प्रायोजित - आंतरिक समस्याओं के इतर उन्माद बाहर से भी प्रायोजित भी होते है। भारत में आतंक फैलाने के लिए पाकिस्तान यहां के युवाओं को पथभ्रष्ट कर उन्हें उन्माद की दिशा में ले जाते हैं जहां उन्हें ज़िहाद के नाम पर उकसाया जाता है।

तो ऐसे में सवाल उठता है कि - इसका समाधान क्या है?

पहला, समाज में व्याप्त समस्याओं का (जैसे- बेरोजगारी, गरीबी) का हल निकालने की दिशा में सरकारी पहल की जरूरत है।

दूसरा,देश के युवाओं के बीच विश्वास पैदा करना होगा, उन्हें समझाने की दिशा में बढ़ना होगा कि उन्माद का रास्ता कई ज़िंदगियों को बर्बाद करता है।

तीसरा,एक सुनियोजित और दूरदर्शी तरीका अपनाकर चरणबद्ध तरीके से विकास की योजनाओं का कार्यान्वयन करना होगा।

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