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विस्तारवादी ड्रैगन की फुंफकार !

- सौरभ नारायण शुक्ला

वर्चस्व का कुरूक्षेत्र: दक्षिण चीन सागर और दक्षिण पूर्व एशिया

1947 में छपे एक नक्शे में चीन ने दक्षिण चीन सागर के चारों तरफ 11 डैश लाइनें खींच घेरा बना दिया. जिसे चीनी प्रीमियर झाउ एनलाई ने घटाकर 9 कर दिया था. 'नाइन-डैश लाइन' सिद्धांत के अनुसार समूचे दक्षिण चीन सागर क्षेत्र पर चीन अधिकार का दावा करता है. ऐतिहासिक रूप से भी चीन इस क्षेत्र को अपना हिस्सा मानता है. ताजा घटनाक्रम के अनुसार इसी क्षेत्र में स्थित 'पैरासेल', 'स्प्रैटली' व अन्य 80 द्वीप समूह का उसने नाम बदल दिया है. चीन का यह विवाद फिलीपींस, वियतनाम, ताइवान, मलेशिया, ब्रूनेई के साथ है. इन द्वीपों पर चीन ने प्रशासनिक नियंत्रण कर सैन्य अड्डा भी स्थापित कर दिया है और ऐसा करने के पीछे चीन का घोर स्वार्थ है.


1982 में 'संयुक्त राष्ट्र समुद्री कानून संधि' अस्तित्व में आई. इस संधि के अनुसार कोई भी देश अपने तटीय सीमा से 200 किलोमीटर के भीतरी समुद्री क्षेत्र में ईंधन-खनिज निष्कासन, फिशिंग और नौकायन कर सकता है. यह संबंधित देश का विशेष आर्थिक क्षेत्र होता है. चीन इसी संधि का गलत फायदा उठाकर, पूरे क्षेत्र पर आधिपत्य चाहता है. चीन के अनुसार यदि पैरासेल और स्प्रैटली द्वीप समूह पर चीन का नियंत्रण है. तो इस संधि के नियम अनुसार (200 किमी क्षेत्र) संपूर्ण दक्षिण चीन सागर पर भी चीन का नियंत्रण होगा. हालांकि चीन की तुलना में पैरासेल द्वीप वियतनाम के नजदीक है, और स्प्रैटली द्वीप समूह फिलिपिंस के नजदीक स्थित है. भौगोलिक दूरी के बावजूद, चीन ऐतिहासिक घटनाओं का हवाला देकर उन पर अपना अधिकार बताता है.

दक्षिण चीन सागर का विवादित क्षेत्र. (तस्वीर साभार: इंटरनेट)

ऐसा माना जाता है कि दक्षिण चीन सागर में भारी मात्रा में तेल, गैस और खनिज भंडार हैं और यह क्षेत्र व्यापार की दृष्टि से अत्यधिक महत्वपूर्ण है. व्यापार ही नहीं, कुछ महत्वपूर्ण व्यावसायिक मार्ग भी इसी क्षेत्र से होकर जाते हैं. 'मलक्का' और 'फार्मोसा' स्ट्रेट इन में प्रमुख हैं. (किसी दो बड़े भूभाग के मध्य स्थित संकरे समुद्री रास्ते को 'स्ट्रेट' कहा जाता है). विश्व का एक तिहाई से अधिक व्यापार इन्हीं स्ट्रेट से होकर गुजरता है. दक्षिण चीन सागर पर अधिकार रखने वाला देश इन रास्तों पर भी नियंत्रण कर सकता है और इस तरह वह अन्य देशों के मध्य अंतर्राष्ट्रीय व्यापार को प्रभावित कर सकता है. इसी वजह से इस क्षेत्र में चीन ने मानवनिर्मित द्वीप 'फायरी क्रॉस रीफ' का निर्माण कर नौसैनिक अड्डा भी बनाया है.


जाहिर है कि सैन्य ताकत जमा कर कर कर चीन इस क्षेत्र में सिर्फ व्यापार तो नहीं करना चाहता, इसकी जड़ें गहरी हैं. चीन इस क्षेत्र में नियंत्रण बनाकर दक्षिण-पूर्व एशिया में अपने प्रभाव को बढ़ाना चाहता है. चीन जानता है कि, आर्थिक और सैन्य ताकत के साथ ही यदि कूटनीतिक सत्ता भी हासिल करनी है, तो उसे दक्षिण पूर्व एशिया में हस्तक्षेप बढा़ना ही होगा. दक्षिण- पूर्व एशिया में अभी यू.एस.ए. का वर्चस्व है.'आसियान' इस क्षेत्र के देशों का समूह है.


(ASEAN) आसियान को अमेरिका लंबे अरसे से एकतरफा आर्थिक सहयोग और सैन्य सुरक्षा देता रहा है. यही नीति हालिया वर्षों में चीन ने भी अपनाई है और आसियान के देशों को आर्थिक मदद देने लगा है. चीन आसियान देशों के बड़े साझेदार के तौर पर उभर रहा है. ऐसा करके चीन शक्ति संतुलन करना चाहता है. इसी प्रक्रिया से दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों को अपने खेमे में लाना चाहता है. ऐसे में स्पष्ट है की लड़ाई वर्चस्व की है. एक तरफ अमेरिका तो दूसरी तरफ चीन. चीन का पक्ष लेना और ना लेना दोनों ही इन देशों (आसियान) के हित में नहीं. बीते दिनों आसियान देशों ने इस खींचतान और खेमाबाजी पर चिंता जाहिर की, और भारत जैसे किसी तीसरे देश के दखल की आवश्यकता जताई. अमेरिका भी भारत से दक्षिण-पूर्वी एशिया में हस्तक्षेप की उम्मीद रखता है, लेकिन भारत इस मसले पर हमेशा से उदासीन रहा है. अब शायद ऑस्ट्रेलिया यह जिम्मा लेने को तैयार है. ऑस्ट्रेलिया का भारी-भरकम रक्षा बजट भी इसी नीति का हिस्सा माना जा सकता है.


जो भी हो, दक्षिण चीन सागर कुरुक्षेत्र बन चुका है, और युद्ध का आगाज भी हो चुका है. रस्साकसी जारी है, देखना दिलचस्प होगा भारत इस गहमागहमी में हिस्सा लेगा या अहस्तक्षेप की पुरानी उदासीन नीति का ही अनुसरण करेगा.


(लेखक अंतर्राष्ट्रीय मामलों के जानकार है)


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