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ए शहरी लड़की....सुनो


ई भालू मतलब टैडी देने के पहले मेरे बारे में जान लो।


टेडी डे स्पेशल


हम यू०पी० के हैं और गाँव में रहते हैं। हम आजतक गाँव से बाहर नहीं निकल पाये हैं। धूप तुम्हारे यहाँ शहर में होती होगी, हमारे यहाँ तो आज भी 'घाम' ही होता है। तुम्हारे यहाँ हॉलीवुड का क्रेज़ होगा। हम तो आज भी निरहुआ, मिथुन और सनी देओल की मार धाड़ वाली पिच्चर के फैन हैं। Despacito या love me like you do पता नहीं क्या चीज़ है? हम तो "याद करा जहिया कुंआर रहलू" और "गोरी तोरी चुनरी बा लाल लाल रे" ही सुनते हैं। अल्ताफ़ राजा हमारे लिए हीरो हैं। एकदम से बौड़म हैं हम। सच में।


चाय पीना नहीं आता हमें। सुड़ुक-सुड़ुक के पीते हैं। नमकीन को चाय में डाल देते हैं, फिर चम्मच से निकाल-निकाल के खाते हैं। सबसे पहले मोमफली अरे हां वही मूंगफली . ‌‌... उसका दाना बिनके खा लेते हैं फिर बाक़ी नमकीन। ऐसे ही बिस्कुट भी खाते हैं, पर कभी कभी बिस्कुट को 'बोर' के भी खा लेते हैं। सबके सामने आम और तरबूज खाने में शरम लगती है। ऊ का है कि धड़ल्ले से खाते हैं न बिना किसी लाज सरम के। रेस्टोरेन्ट जाने में घबराते हैं। हाँ.. सड़क के किनारे कोई ढाबा हुआ तो वहाँ आराम से खाते हैं चांप के। एकदम ठोस देहाती हैं हम। सच में।


टेडी डे स्पेशल


ड्रेसिंग सेंस एकदम शून्य है हमारा। लाल शर्ट के साथ हरी पैंट पहन लेते हैं। बालों में तेल सरसों वाला लगाते हैं। पुरुषों वाली फेस क्रीम (फेयर-हैंडसम) और स्त्रियों वाली फेस क्रीम (फेयर-लवली) में कोई भेद नहीं करते। जो सामने दिख गई वही लगा लेते हैं। कई बार फेसवाश को हेयर जेल समझ के बालों में लगाए हैं। शैम्पू केवल बालों में लगाने के लिए नहीं लाते, हाथ पैर भी धो लेते हैं उसी से। हम परफ्यूम डियो नहीं लगाते ,बेला वाला कन्नौज का सेंट लगाते हैं। बहुत बड़े वाले पगलेट हैं हम। सच में।


सामाजिकता तुम्हारी भाषा में एटीकेट्स की समझ नहीं है। बात करने में लड़खड़ा जाते हैं। हम दोस्तों से मिलते हैं तो हाय हैलो नहीं करते हैं। बल्कि चिल्ला के कहते हैं "कस रे सारे, कहां घूमत अहे बे। मार्केटिंग नहीं आती हमें। मोलभाव आई मीन बार्गेनिंग नहीं कर पाते हैं हम। घर से मार्केट जाते हैं और कोई न कोई चीज़ लाना भूल जाते हैं हम। सब्जी लेने जाते हैं तो मोबाइल में लिख के जाते हैं। अपने लिए ख़ुद से शर्ट-पैंट नहीं पसंद कर पाते और न ही ख़रीद पाते हैं। थोड़े क्या पूरे ही चिलबिल्ले हैं हम।


अब बताओ

क्या तुम इस गंवार , देहाती, चिलबिल्ले, बौड़म, पगलेट के साथ अपनी जिन्दगी झंड करोगी...??

लेखक: अज़नबी आशिक़

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