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बनारस यात्रा - भाग 2 : सफर जो अभी बाकी था...

कृष्ण मुरारी

लंबा सफर तय करने के लिए कुछ समय ठहर जाना जरूरी है। ठहरना आपको ऊर्जावान तो बनाता ही है बल्कि चीजों को जानने के लिए उत्सुक और जिज्ञासु भी बनाता है।

           बीएचयू के राजा राममोहन राय छात्रावास में ठहरने के बाद अगली सुबह हम चार मित्रों के साथ निकल पड़े एक बार और शहर को छान मारने। अगर शुरुआत गंगा घाट से ही हो जाए तो क्या कहने। 

                   संकरी गलियों से रास्ते तलाशते हुए हम मणिकर्णिका घाट पहुंच चुके थे। दुनिया की तमाम भौतिकता, छलावों,असत्यों से दूर इस घाट की खूबसूरती है कि यहां आकर व्यक्ति जीवन के अंतिम और एकमात्र सत्य से साक्षात्कार कर पाता है। इस सब के इतर गंगा जी में बढ़ती गंदगी मेरे मन को उद्वेलित कर रही थी।

              गंगा जी को पास से महसूस करने और उसके स्पर्श की चाहत हमें नाव की सवारी करने तक ले आई। शहर में रह रहे लोगों को ये अनुभव कभी-कभी ही मिलता है।


Varanasi

   मल्लाह हम पांच लोगों के वजन को अपनी छाती के सहारे नाव को आगे बढ़ा रहा था। पूछने पर उसने बताया कि वह पिछले 12 सालों से यह काम कर रहा है। हम आगे बढ़ते जा रहे थे। सूर्य की किरने लगातार गंगा जी के सौंदर्य को बढ़ा रही थी मानों सूर्य देवता ने इस काम के लिए खुद को झोंक दिया हो। गंगा जी को भारतीय दर्शन में मां के रूप में माना गया है। इसका कारण है कि यह सभी को अपने भीतर स्थान देती है। हर वर्ष प्रवासी पक्षियां अपने जीवन का कुछ समय लंबा सफर तय करके यहां बिताते हैं। साइबेरियन पक्षियां यहां आए पर्यटकों को आकर्षित करती है।

          आंखे लगातार खूबसूरत घाटों को कैद कर रहा था। न जाने मणिकर्णिका से शुरू हुआ सफर अस्सी  तक कब पहुंच गया - पता ही नहीं चला। सीढ़ियों से चढ़कर पिजेरिया कैफ़े को देखते हुए हम निकल पड़े काशी कैफ़े - चाय पीने के लिए। पीतल के बर्तन में पक रही चाय, कुल्हड़ और चाय का स्वाद- यहां की पहचान है। हम आगे बढ़े अगली मंजिल - "शांति और प्रेम की भूमि, बुद्ध की भूमि, ज्ञान की भूमि - सारनाथ। 

          कहा जाता है कि महात्मा बुद्ध ने अपना पहला उपदेश यही दिया था। आप हमेशा अपने मन में अंजानी चीजों, अंजानी जगहों और लोगों का चित्र बना लेते हैं। ऐसे ही चित्र मेरे मन में बचपन से सारनाथ के लिए बनी हुई थी। यहां पहुंचकर लगा कि हम ठीक उस दौर में पहुंच गए जब इनकी शुरुआत हुई होगी। बनारस शहर से दूर बसा सारनाथ बौद्ध धर्म के लोगों के लिए पवित्र स्थान है। सारनाथ - अशोक के बिना अधूरा है।यहां अनेक शिलालेख है जो सम्राट अशोक के समय के हैं।

 भूतकाल आपको वर्तमान की समझ देता है और भविष्य के लिए भी तैयार करता है। अब समय था बनारस के जाम से दो-चार होने का। सड़कों पर गाड़ियां रेंग रही थी। कुछ मिनटों का सफर घंटों में तय हुआ और हम फिर पहुंच गए लंका गेट पर।

              यहां से हम निकले दिन के अंतिम सफर के लिए। बनारस शहर में असंख्य मंदिर है। सबकी अपनी मान्यताएं  है। गहराती शाम और खूबसूरत शहर मानों दिल में उतर गया हो।  पैर थम  नहीं रहे थे - क्योंकि शायद इसे मालूम था कि ये इसके खूबसूरत दिनों में से एक है।

         प्राचीन और प्रसिद्ध संकटमोचन मंदिर तक हम पहुंच गए थे। इसकी भव्यता और प्राचीनता मनमोहक है। लगते जयकारों के बीच मेरे स्वर भी जयकारों में शामिल हो गए और कहने लगे - " नमः पार्वती पतियायः - हर हर महादेव।"

          मन उदास हो चला था। लौटने का वक़्त हो गया था। लेकिन एक आस थी, कुछ देर ठहर के - फिर एक लंबे सफ़र को निकल पड़ने की।

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