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"आधी आबादी" को तैयार होने की ज़रूरत है, फौलादी बनने की ज़रूरत है

कालेज के लिए निकलते ही कुछ सीसीटीवी टाइप आखें मुझे घूरने लगती हैं टैक्सी पर बैठते ही बगल बैठा इंसान मोबाइल डिस्प्ले पर अपना नंबर दिखाने लगता है चांदनी साहू


सांकेतिक तस्वीर साभार: इंटरनेट

अक्सर हमारा समाज "आधी आबादी" की पूरी आज़ादी की बात करता है, और उनके अधिकारों की रक्षा के लिए सदैव तत्पर रहता है। उन्हें बराबरी का हक दिलाना चाहता हैं, फिर चूक कहां हो जाती है जो उनके साथ अपराध हो जाता है।

महिलाओं के सम्मान व अधिकारों पर चर्चा होना बिल्कुल जायज है पर महिलाओं के अधिकारों पर सिर्फ़ पुरुष वर्ग ही चर्चा करे, अज़ीब लगता है। ज़्यादातर कार्यक्रमों में पुरुष बहुलता होती है स्त्रियों की संख्या बेहद कम होती है।


हमारे देश ने बहुत तरक्की हासिल की है पर हमारी "स्त्रियों के प्रति सोच" आज भी पुराने समय जैसी ही है। आज भी एसी कमरों में बैठे पिताजी बिना बेटी की सहमति के ही शादी के फैसले कर रहे होते हैं। कितना अजीब लगता है, लड़की की जिंदगी से जुड़े एक अहम फैसले में वही न शामिल रहे। समाज की समझ का अंदाजा लगाना बेहद मुश्किल है। जिस समाज को रील लाइफ में लवस्टोरी फिल्में पसंद है उसे ही रियल लाइफ की लवस्टोरी से चिढ़ होती है।


ऐसा सिर्फ किसी विशेष स्थान पर ही नहीं होता बल्कि भारत के ज्यादातर गांवों और शहरों में ये स्थिति आम है। जहां एक ओर हम गांव को चरित्र निर्माण का महत्वपूर्ण स्थान मानते हैं पर कुछ दिनों में घटित घटनाओं ने इस भ्रम को ही तोड़ दिया।

मेरे पड़ोस के गांव जूड़ापुर में सालभर पहले एक रात चार लोगों की हत्या की जाती है और फिर कुकर्मियों द्वारा लाश के साथ हैवानियत की जाती है। ऐसा करने वाले वो लड़के हैं जिनकी उम्र अभी देश दुनिया समझने की है, जिन्हें समाज भविष्य के विकास का कारक मानता है पर उन लड़कों के दिमागी दशा पर तो तरस और गुस्सा आता है ऐसे वाहियात लडको की दिमागी दशा कब सुधरेगी? इसका जवाब किसी के पास नहीं है।


कुछ लोगों को लगता है कि कम कपड़े पहनने के कारण ही लड़कियों से रेप की घटना होती है पर मेरा सवाल यह है कि क्या 5-6 साल की लड़की को भी घूँघट और बुर्के में रखा जाय, और फिर क्या गारंटी की लोगो की गंदी भावना बदल जाएगी।


मैं खुद एक लड़की हूं कालेज के लिए निकलते ही कुछ सीसीटीवी टाइप आखें मुझे घूरने लगती हैं टैक्सी पर बैठते ही बगल बैठा इंसान मोबाइल डिस्प्ले पर अपना नम्बर दिखाने लगता है, पीछे से भी गंदे कमेंट पास किए जाते हैं। ऐसा सिर्फ मेरे साथ नहीं है बल्कि देश की बहुत सारी लड़कियों के साथ यह रोज़ ही होता है। धीरे-धीरे इन चीज़ों की आदत हो जाती है और सबकुछ सामान्य सा लगने लगता है।


सिर्फ सेक्स एजूकेशन पर बात कर लेने से या लागू कर देने मात्र से ही महिलाओं के प्रति हो रहे अपराध कम नहीं हो जाते। इस बड़ी समस्या में कमी लाने के लिए युवाओं के अन्दर बौद्धिक विकास होना जरूरी है जो शिक्षा के जरिए ही सम्भव है पर सेक्स एजुकेशन ही एक मात्र विकल्प नहीं हो सकता।


हर तरफ से महिलाओं को पीसा जा रहा है कभी उनके अधिकारों को लेकर तो कभी उनके मिलने वाले सम्मान को लेकर।

भला हो सानिया मिर्जा, पीवी सिंधु, साइना नेहवाल, टीना डाबी, अंजना ओम कश्यप, श्वेता सिंह, दीपिका पादुकोण, बबिता फोगाट, जैसी शख्सियतो का जिन्होंने "आधी आबादी" को उनकी शक्ति पहचानने के लिए खुद एक आइडल बनकर सामने आयी।


ऐसी शख्सियत का लगातार पैदा होना ही लोगों की गंदी हो चुकी मानसिकता को बदल सकता है, इसके लिए हम "आधी आबादी" को तैयार होने की ज़रूरत है, फौलादी बनने की ज़रूरत है।



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